Thursday, 8 October 2026

रुको ,ज़रा ...

रूको ,कहाँ भागे जा रहे हो 

 इस भीड़ में ,भीड़ के पीछे 

 देखा -देखी ,होड़ा -होड़ 

 बड़ा मकान ,बड़ी कार 

  और बड़ी ,और बड़ी 

अंतहीन सिलसिला 

  बदले में टेंशन , डिप्रेशन

   ज़रा ठहरो ...सोचो 

      शांति कहाँ है ?सुकून कहाँ है ?

       कहाँ मिलेगी ....

       अंतहीन सिलसिला है ...

        मकान को घर बनाओ ..

        चैन की बंसी बजाओ ।

  शुभा मेहता 

  8th ,oct ,2026


    

13 comments:

  1. सरल शब्दों में कितनी सच्ची बात कह गयी दी।
    भाग-दौड़,मारा-मारी, कितना हास्यास्पद है न सुकून लुटा रहे सुकून पाने के लिए...।
    सादर।
    -------
    जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार ९ अक्टूबर २०२६ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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  2. बहुत-बहुत धन्यवाद प्रिय श्वेता ,मेरी रचना को इस मंच पर स्थान देने के लिए ।

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  3. पहले मकान को घर बनाओ फिर अपने दिल को, उसमें ही रहती है असली शांति

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    1. बहुत बहुत आभार अनीता जी

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  4. प्रेरित करती पंक्तियाँ !

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  5. बहुत-बहुत धन्यवाद

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  6. बहुत बढ़िया शुभा जी 👌! जैसी सरल शुभा जी वैसी सरल अभिव्यक्ति! सच मे "मकान को घर बनाओ और चैन की बंसी बजाओ" यही कर लें कोई तो दुःख काहे का 🙏

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    1. बहुत -बहुत धन्यवकद प्रिय सखी रेणू जी

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  7. Replies
    1. बहुत-बहुत धन्यवाद

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  8. सुन्दर सृजन

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  9. बहुत -बहुत धनंयवाद

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