अभिव्यक्ति

Wednesday, 24 August 2016

कान्हा.....

›
    ओ कान्हा......       इक बार तो आओ       संग मेरे भी       फाग रचाओ       अरे , सुनते क्यों नहीं ?      बैठ कभी कदंब डाल पर    छेडो...
1 comment:
Saturday, 13 August 2016

एकाकी

›
    सुना था        कान होते हैं         दीवारों के भी         पर अब जाना         कि कान ही नहीं          दीवारें तो       होती हैं सशर...
13 comments:
Saturday, 6 August 2016

दोस्ती

›
  बचपन में इक दूजे की     थाम उँगली चलना       खेलना -कूदना        लडना -झगडना        एक ही खिलौने के लिए         कभी शाला में        ...
23 comments:
Saturday, 16 July 2016

झूला

›
    एक वृक्ष कटा      साथ ही      कट गई     कई आशाएँ       कितने घोंसले        पक्षी निराधार        सहमी चहचहाहट        वो पत्तों की ...
22 comments:
Tuesday, 5 July 2016

लोग

›
    बंद किवाड़ों की     दरारों से झाँकते लोग      दिवारों से कान लगा कर       कुछ सुनते -सुनाते लोग       फिर, लगाकर नमक - मिर्च       ...
11 comments:
Thursday, 2 June 2016

मिट्टी

›
   सुबह-सुबह अचानक     मिट्टी की सौंधी खुशबू      तर कर गई      तन -मन को       उठ कर देखा      तो पाया       बरखा की बूँदो ने       ...
9 comments:
Sunday, 15 May 2016

शब्द

›
  शब्द ...      प्रस्फुटित होते हुए       धीरे -धीरे       ले रहे आकार        एक रचना का        टेढ़े -मेढ़े          छोटे ;बड़े        ...
2 comments:
‹
›
Home
View web version

कुछ मेरे बारे में

My photo
शुभा
मैं ,शुभा ,बचपन से ही पढ़ने का शौक रहा है । अब मैं अपने जीवन की छोटी छोटी अनुभूतियों को कविताओं और लेखों में पिरोने की कोशिश करती हूँ ।
View my complete profile
Powered by Blogger.