"आपके मसालेदान में कभी मसाले होते ही नहीं ,जब देखो तब खाली" बहू बोली .....। मैं बस मुस्कुरा कर रह गई।
मुझे साफ ,चमकता रंग बिरंगे मसालों से सजा मसालेदान बहुत अच्छा लगता था । हर सप्ताह धो कर चमकाती ,फिर मसालों से सजा मसालेदान देखकर बडी खुश होती ।
मिर्च, धनिया ,हल्दी रंग-बिरंगे मसाले .....
लेकिन जब भी अच्छी तरह साफ करती ,मसाले भरती
अक्सर ही मसालेदान या तो हडबडी में टेढा हो जाता और सारे मसाले आपस में गड्डमड्ड.... .बहुत बुरा लगता
फिर मैंनें भी बस थोड़े-थोड़े मसाले ही निकालने शुरु कर दिए और फिर ये आदत में शुमार हो गया ।
मैं समझती हूँ कई घरों में इस तरह की (बेतुकी)बातें होती होगीं उनका उदभव भी शायद ऐसे ही हुआ होगा ।...अब जिसे असलियत पता न हो उसे तो ये बात बेतुकी ही लगेगी .न कि भला कोई इतने कम मसाले क्यों निकालेगा ..
है न ......।