Friday, 17 January 2020

अंधा बाँटे रेवडी..

स्कूल से घर आते ही दीदी का रिकॉर्ड चालू हो गया ..कह रही थी कितना अच्छा ,सुरीला मधुर गाना गाया था उस बच्ची नें ,पर इनाम तो उस ट्रस्टी की बेटी को ही दिया ...जब ऐसा ही करना था तो हमें बुलाया ही क्यों था जज बनाकर । सब दिखावा है ..पहले ही ऑफिस में बुलाकर कह दिया कि प्रथम पुरस्कार तो इसे ही देना होगा ..ये भी भला कोई बात हुई ..बस दीदी बोले जा रही थी ...हर साल इसी ट्रस्टी की बेटी को ही इनाम दिलवाते है ..न सुर का ठिकाना न ताल का ..उस बेचारी बच्ची का चेहरा देखा था ,कैसा उतर गया था  ..ये तो वो ही बात हुई न कि अंधा बाँटे रेवडी फिर -फिर उसी को दे। 
   मैं बोली दीदी ये रेवडी अंधा कैसे बाँटता होगा ,उसे कैसे पता चले कि बँटवारा बराबर हुआ है या नहीं ..दीदी मुझे देखकर मुस्कुरा दी ..बोली अभी तुम छोटी हो ,बडी होगी तब सब समझ जाओगी ।  
चलो अब सो जाओ थोडी देर । मैं भी थकी हुई थी जल्दी ही आँख लग गई । तभी सपने में क्या देखती हूँ एक अंधा बडे से झोले में रेवडिय़ां लेकर आ रहा है ,दूसरे हाथ में डंडा है । जब भी मैं रेवडी लेने आगे बढती वो जोर से डंडा पछाडता ..सपने में भी रेवडी न मिली ।  
बडी़ हुई ,अच्छी शिक्षा प्राप्त करली , खूब अच्छा रिजल्ट ढेरों सार्टिफिकेट सब कुछ है मेरे पास ,बस सिफारिश नहीं । कल एक कंपनी में इन्टरव्यू है । थोडी चिंता में हूँ । 
  सुबह माँ नें दही-चीनी खिलाकर आशीर्वाद दिया सब अच्छा होगा कह कर विदा किया । इन्टरव्यू बहुत अच्छा हुआ ,पता लगा कि नौकरी तो सभी उच्चधिकारियों के रिश्तेदारो़ को दी जा चुकी है । अब समझ आया .......।स्कूल हो दफ्तर हो गांव हो ,शहर हो या देश ,अंधा भी शायद गंध पहचान कर रेवडी बाँटता है । 

  शुभा मेहता 
   17thJan 2020
 



   

  
 
  
  

Friday, 10 January 2020

चोट

लगी ज़रा सी चोट 
तो ,मम्मा दौडी़-दौडी़ आती है 
उठाती झट से गोदी में
  और प्यार से वो सहलाती है ।
  कहाँ लगी है जरा बताओ
   पूछ-पूछ घबराती है
    देख निकलता खून ज़रा -सा 
     रोनी-सी हो जाती है ।
      अभी ठीक हो जाएगा 
     यह कह ढाँढस बंधाती है 
       लेकर अपने पल्लू को 
       वो मेरी चोट सहलाती है 
        मैं भी चुप हो गोद में उसकी 
        सुख स्वर्ग सा पाती हूँ 
         इतना प्यार भला ये मम्मा 
        ले कहाँ से आती है । 


     
   शुभा मेहता 
  11th ,January ,2020
          
        

Friday, 3 January 2020

दुआ

कितनी दुआएँ माँगी थी 
कहाँ -कहाँ ना माथा टेका 
 मंदिर ,मस्जिद ,गुरुद्वारों में
 भटके थे .......
 बस ,एक पुत्र की आस में 
  जो तारेगा वंश 
  सोच तो यही थी ।
   कौनसी दुआ फली 
      नहीं मालूम ..?
       पुत्र जन्मा ..
       बधाईयाँ ,मंगलगान ..
        क्या ,माहौल था ,
        चारों ओर बस 
       खुशी ही खुशी थी 
        वृद्धाश्रम में बेठी माँ ...
        सोच रही थी ..काश 
          ना होती कबूल
            मेरी दुआ ...।
    

शुभा मेहता 
3rd Jan .2020
        
  

Tuesday, 31 December 2019

अगवानी

क्या हुआ जो तुम 
  लक्ष्य न पूरा कर पाए 
   सपनें जो देखे थे 
    वो आधे ही हो पाए ....पूरे ,
     रखो हौसला 
      हिम्मत जोडो़
      फिर से ....
    जो   मिला है अवसर 
      उसे न छोडो
     जुट जाओ ,
       पा लो, जो चाहते हो पाना 
         कर लो मेहनत 
        नामुमकिन तो कुछ भी नहीं 
         ठान लो मन में
          करो अगवानी नववर्ष की 
         नया जोशऔर नई उमंग ।


शुभा मेहता 
31st ,Dec ,2019
            

      

Saturday, 14 December 2019

चाय -दर्शन

सभी चाय प्रेमियों को सादर समर्पित .....🙏
  एक गरम ,
  चाय की प्याली
  देती अलसायों को 
  अद्भुत ताजगी 
   सभी चाय प्रेमियों की
     पसंद अलग-अलग 
     कोई मन भाए अदरक वाली ,
   कोई मसाले वाली 
    कोई पीवे  डाल इलायची 
   कोई पुदीने वाली ।
    जीवन भी लगता 
     मुझको तो
     चाय की प्याली जैसा 
       कभी कडक ,
     कभी माइल्ड ..
       कभी कम चीनी 
      कभी अधिक ..
       अगर डाल दो पत्ती ज्यादा 
     देती है कडवाहट 
      जीवन भी तो ऐसा ही है 
      कभी मीठा ,कभी कडवा .।

  शुभा मेहता 
  16 th Dec ,2019 
    
   
   
     

Thursday, 12 December 2019

अलाव

पूस की ठिठुरती रात में 
 बैठ जाते अलाव जलाकर 
 जिनका न कोई ,ठौर -ठिकाना 
  ना बिस्तर ,ना कंबल 
   आग सेकते..
   कुछ कुत्ते -बिल्ली भी साथ में
     ठंडी हवाएं ,ठरता अलाव 
      उनींदी आँखेँ ..
       आँखों म़े सपने 
        बस इतने 
         काश होता इक घर 
           चाहे छोटा सा ..
            होता इक बिस्तर 
           बस इक कंबल .....
             चैन से तो सोता ।
       शुभा मेहता 
       12th Dec ,2019

Thursday, 5 December 2019

हालात

बिगड़े हालात कुछ ऐसे 
 कि,संभल  ना पाए 
   जालिम जमानें के आगे 
    हम तो कुछ न कर पाए 
     अस्मतें लुट रही हैं आज
      सरे बाज़ार.......
       कुछ तमाशबीन जुटे हैं
       और कुछ चिल्लाए 
          लुटती अस्मतों को तो
           कोई बचा ना पाए 
           बन रहा  आज का मानव 
             कितना हिंसक
           शेर-चीते भी 
        आज देख इन्हें शरमाएँ ।