Monday, 28 November 2016

प्रेम ...

    प्रेम ...
      खुशबू है
     गुलाबों की
    जैसे हर इक
     पत्ती से आती आवाज
        खूबसूरत गुनगुनाहट
        प्रेम.....
         गीत है
         आत्मा का
          लयबद्ध नृत्य है
         सूर्य,चंन्द्रमा,  तारे
         सभी का प्रकाश है प्रेम.....
        प्रेम .....
         भक्ति है ,स्तुति है
           कृष्ण है..
             मीरा है ,राधा है.....प्रेम .....
       
          
               शुभा मेहता
                28th Nov 2016

Saturday, 26 November 2016

उड़ता पंछी

   मैं , उडता पंछी
    दूर....दूर .....
    उन्मुक्त गगन तक
     फैलाकर अपनी पाँखें
    उड़ता हूँ
      कभी अटकता
       कभी भटकता
       पाने को मंजिल
      इच्छाएँ ,आकांक्षाएँ
      बढती चली जातीं
      और दूर तक जाने की
      खाता हूँ ठोकरें भी
      होता हूँ घायल भी
      पंख फडफडाते हैं
     कुछ टूट भी जाते हैं
      और फिर , अपना सा कोई
     कर देता है
      मरहम -पट्टी
     देता है दाना -पानी
    जरा सहलाता है प्यारसे
   जगाता है फिर से प्यास
    और ऊपर उड़ने की
     और मैं चल पड़ता हूँ
      फिर से पंख पसार
    अपनी मंजिल की ओर ....।

                 शुभा मेहता
                19th Nov .2016

Friday, 25 November 2016

2016 -एक आकलन

  सन् 2016 अब समाप्ति के कगार पर है । वर्ष  का अंतिम महीना बस शुरु होने ही वाला है ।नये वर्ष  के आगमन की प्रतीक्षा है ।
     चलिए आज आकलन करते हैं, पिछले ग्यारह महीनों में , क्या खोया क्या पाया ?
      अब जरा पीछे की ओर नजर दौडाते हैं.....
     जनवरी 2016 ..नववर्ष की शुभकामनाएँ ,पार्टी, खेल ...वाह !कितना मजा आया था न ।
    पर क्या हमें वो वादे याद हैं ,जो हमनें स्वयं से किये थे । जिन पर हमने ईमानदारी से चलने की कसम ली थी ,हाँ याद है न मैंने तो सुबह जल्दी उठकर व्यायाम करने की कसम ली थी ..और मैंने .................
   पर समय कहाँ मिल पाता है रोज -रोज ......
      साल के पहले दिन हम सभी जोश ही जोश में कुछ नया करने , जीवन में बहुत कुछ पाने के, और भी न जाने क्या क्या वादे स्वयम् से कर लेते हैं ,और फिर जुट भी जाते हैं ,उन्हें पूरा करने में पूरे जोश के साथ ।
फिर धीरे -धीरे जैसे -जैसे समय गुजरता जाता है सब ठप्प ....। कुछ ही लोग होते हैं जो अंत तक जुटे रहते हैं और सफल भी होते हैं
    सोचने वाली बात है ऐसा क्यों होता है ,हम क्यों स्वयम् से किया वादा निभा नहीं पाते ?
  कारण , या तो हमारा आलस या नीरसता और हम असफलता का दोष समय को देने लगते है ..क्या करें टाइम ही नही मिलता ऐसे वाक्यों से मन को बहलाते हैं
अरे, समय तो सभी के पास समान ही होता है फिर क्यों कोई सफल और कोई असफल ....
   चलिये कोई बात नहीं ,अभी भी समय है ,एक महीना ,जितना भी हो सके उतना पा लो ,आज ही से शुरुआत कर दें ,कुछ तो मिलेगा और नववर्ष  आने पर फिर एक नया प्रण ...पर इस बार पूरी ईमानदारी से ।
 
  

Saturday, 19 November 2016

मेरे अनुभव ( गाँठें )

   बच्चे बगीचे में खेल रहे थे ,कोई दौड़ रहा था , कोई रस्सी कूद रहा था । मैं बेंच पर बैठकर उन्हें देख रह थी ।कितने निष्फिक्र थे सभी , अचानक क बच्ची मेरे पास आकर बोली ,"आंटी , देखो न , हमारी रस्सी में गाँठ पड़ गई है क्या आप इसे खोल देगीं ।" मैंने कहा ,क्यों नहीं ,देखो अभी खोल देती हूँ .इतना कह मैंने रस्सी हाथ में ली देखा अभी तो गाँठ ढीली है ,झट से खोल कर उसे दे दी । बच्ची खुश होते हुए धन्यवाद बोलकर फिर खेलने में मगन ।
      इधर मैं सोचने लगी चलो आसानी से खुल गई गाँठ , अभी ज्यादा कसी नही थी न ।
     दोस्तों , हम भी जाने -अनजाने रोज ऐसी कई गाँठें अपनें मन रूपी धागे में लगा लेते हैं ,जिन्हें अगर समय रहते खोल न लिया जाए तो वो कसती ही जाती हैं और करती हैं हमें तनावग्रस्त ,लाख कोशिशों बावजूद हम उन्हें खोल नहीं पाते ।
     कभी किसी की कही बात से मन को ठेस पहुँचती है ,और फिर बँध जाती है गाँठ। और चल पडते हैं हम नकारात्मकता की ओर, मन के हर कोनें में संग्रह करते जाते हैं गाँठों को ।ऐसा करके हम अपने आप को ही हानि पहुँचा रहे होते है ।(अब दुनियाँमें सभी लोग हमें एक जैसे तो नहीं मिलने वाले ।)
     पर अब नहीं .....चलिये एक कदम सकारात्मकता की ओर बढाएँ...समय आ गया है एक-एक गाँठ खोलने का , आँख मूंदकर धीरे-धीरे एक एक गाँठ खोलने का प्रयत्न करें, जरूर सफल होंगे और म का बोझ हल्का होने लगेगा फिर कदम हल्के होंगें ,जीवन से रोग दूर होंगे ,लक्ष्य प्राप्ति सुगम बनेगी ।
     एक कदम सकारात्मकता की ओर आज से ही....।

Friday, 11 November 2016

सवेरा

   उठो जागो मन.....
  हुआ नया सवेरा
आ गये आदित्य
  लिए आशा किरन नई
रमता जोगी ,गाए मल्हार
  झूम रहे खग वृंद
   नाचे गगन अपार
    कलियाँ चटक उठी
    चटक कर
   करा रही
नवसृजन आभास
  हरी दूब पर
  ओस बूँदों नें
    सजा दिए जैसे
   मोती हार
पक्षियों का मीठा कलरव
जगा रहा है बार -बार
उठो जागो मन....
   हुआ नया सवेरा .....
 
             शुभा मेहता
              11th Nov 2016