Monday, 11 November 2013

अखंड सौभाग्य

अखंड सौभाग्यवती रहो -रमा को दादी की आवाज सुनाई दी। यह तो उनके घर का रोज का क्रम था ,जब भी माँ पूजा करके माँ के पैर छूती दादी उन्हें रोज यही आशीष देती । तब रमा को इसका मतलब पता नहीँ था क्योंकि वह बहुत छोटी थी ,लेकिन उसके बालमन पर यह अंकित हो चुका था कि ये सबसे अच्छा आशीर्वाद है कारण रमा की दादी भी उसकी माँ से बहुत स्नेह रखती थी । उसके पिताजी भी हर काम माँ की सलाह से ही करते थे । कुल मिलाकार उनका परिवार एक खुशहाल परिवार था ।  समय का चक्र चलता रहा ,आज रमा की शादी है ,वह खुश है आज उसे भी वही आशीर्वाद मिल रहा है। रमा विदा होकर ससुराल आ गई है । ससुराल का वातावरण जरा भिन्न है पति उग्र स्वभाव के है । वह ससुराल में हमेशा सबको खुश रखने की कोशिश करती रहती । इस बीच वह दो संतानों की माँ बन चुकी है ।समय  गुजरता रहा
उसके पति अब रिटायर हो चुके हैं ,बच्चे पढ-लिख कर स्थाई हो चुके हैं । पति का स्वभाव उग्र से उग्रतर होता जा रहा है । अब वह मन ही मन सोचती कि उसके बाद कौन इनका ध्यान रखेगा ? रमा अब मजबूर थी  । हे ईश्वर उसकी इतने सालों की प्रार्थना को मत सुनना ।

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