Saturday, 13 December 2014

घर

  मेरा घर ,प्यारा घर ,
         छोटा ही सही  ,एक सुंदर  घर ,
     दौड़ती हूँ जहाँ मैं इधर-उधर  ,
      देखती हूँ झरोखे से उन्मुक्त गगन ।
       करती हूँ उसका खूब जतन 
      एक ओर टिमटिमाता दिया ,
     भीनी सी खुशबू स्नेह भरी ।
     वो गमलों से आती मिट्टी की सौंधास,
       खिले हुए हैं फूल गुलाब ,मोगरा ,जूही ,
     वो बेल चमेली की है मेरी सहेली ,
       वो फूल सूरजमुखी का
       दिलाता है अहसास सूर्योदय का
     महक जाता  है  जिनसे मेरा घर संसार ।
     
     
 

No comments:

Post a Comment