ध्यान का शब्दिक अर्थ है -किसी भी काम को मन लगा के करना । बचपन में स्कूल में शिक्षक कहते थे "ध्यान से सुनो" ,या हम जब भी कोई काम सीखते हैं तब सिखाने वाले कहते हैं-ध्यान से देखो ---यानि इसका अर्थ यही हैं कि किसी भी काम को एकाग्रता से करना
मैंने अक्सर देखा है जब भी कोई व्यक्ति अपनी पसंद का काम करता है तो उसमे पूरी तरह डूब जाता है जैसे राधा जब रोटी बनाती है तो इतने ध्यान से गोल-गोल ,छोटी छोटी बनाती है उसका ध्यान इसी में रहता है की सभी रोटियां एक ही आकार की बने और उस समय अगर कोई उसे बुलाये तो कम से कम तीन -चार बार आवाज देनी पड़ती है । इसी तरह रमा जब पेंटिंग करती है और विभा गाने का अभ्यास करती है तब उनका भी यही हाल होता है ,उन्हे आसपास की सुधबुध नहीं रहती ।
तो आप इन सबको क्या कहेंगे ?मेरे हिसाब से ये ध्यान की और जाने का पहला कदम है ।
जब भी कोई इतनी तल्लीनता से काम करता है तब विचार आने स्वतः ही कम हो जाते हैं ,मन शांत और प्रसन्न हो जाता है ।
इससे थोडा आगे बढ़कर देखें तो "ध्यान" योग का आठवां अंग है । इसके अभ्यास से शरीर और मन दोनों के कष्ट कम हो जाते हैं ।
लेकिन सिर्फ आँख बंद करके बैठना ध्यान नही है ।बहुत से गुरु अलग -अलग शिविरों में ध्यान की तकनीक सिखाते हैं ,जैसे 100 से 1 तक उलटी गिनती गिनो । शायद ऐसा करने से व्यक्ति उसी में तल्लीन हो जाता होगा और अन्य विचार कम आते होंगे ।
धीरे धीरे अभ्यास से हम अपने मन और मस्तिष्क की अनावश्यक कल्पनाओं को कम कर सकते हैं ।
ध्यान हमारे शारीर ,मन और आत्मा के बीच लयात्मक सम्बन्ध बनाता है ।इससे मन और शरीर को अप्रतिम ऊर्जा मिलती है ।
Saturday, 13 December 2014
एकाग्रता और ध्यान
Friday, 5 December 2014
जीवन की मुस्कान
जब भी तुम गलियों से गुजरो ,अपने चेहरे पर मुस्कान ओढ़ लो ,और देखो कितने लोग पलट कर मुस्कुराते है ।
मुस्कुराओ,मुस्कुराओ तुम्हारी मुस्कराहट तनाव को कम करेगी ।
ये सब बातें पढ़ने और सुनने में कितनी अच्छी लगती हैं पर क्या वाकई में हम ऐसा करते हैं ,नहीं ना ।
आजकल जिसे देखो वह तनाव ग्रस्त रहता है । प्रेशर -प्रेशर , बस सभी को किसी न किसी चीज का तनाव । नौकरी में तनाव ,व्यवसाय में तनाव, विद्यार्थी की पढाई का तनाव यहाँ तक आज कल छोटे-छोटे बच्चे भी तनाव ग्रस्त रहते हैं । पुस्तकों का बोझ उठाते -उठाते न जाने उनका बचपन कहाँ खो जाता है । और फिर दसवीं तक पहुँचते-पहुँचते बच्चे इतने तनावग्रस्त हो जाते हैं कि कई बार उन्हें मनोचकित्सक के पास ले जाना पड़ता है ।
वास्तव में ख़ुशी है क्या?
ये तो हमारे अन्तर मन की प्रेरणा है ।जिसे हम अपनी भौतिक सुख सुविधाऒ को जुटानें और जिम्मेदारियों को निभानें में खोते जा रहे हैं ,और फिर दोष देते हैं परिस्थितियों को या फिर लोगों को । सोचतें हैं के शायद ऐसा होता तो ज्यादा मज़ा आता या वैसा होता तो हम अधिक खुश होते । फिर धीरे धीरे ये हमारी आदत बन जाती है कि सामने आई ख़ुशी हमे नज़र ही नहीं आती ।
वैसे अधिकतर लोग ज़िन्दगी को पूरी तरह जी ही नहीं पाते क्योंकि हम अपने दिमाग को भी कुछ हदों में बांध लेते हैं और हर चीज़ की उसी तरह देखना चाहते हैं जैसा दिमाग में सेट किया होता है ,अगर हमारे माइंड सेट से कुछ अलग हुआ तो उसे स्वीकार नहीं कर पाते और फिर सिलसिला शुरू होता है तनाव , डिप्रेशन का ।
याद कीजिये बचपन में जब छोटी चॉकलेट मिलती थी तो हम कितने खुश ही जाते थे ,मानो दुनियां भर की खुशियाँ मिल गई हों । तो फिर देर कैसी ? जीवन को देखना शुरू कीजिए बच्चे के मन से ,जीने का थोडा सा तरीका बदलिये बस फिर खुशियाँ आपकी झोली में ।
ये तो आपके मन में ही है ,टोर्च लेकर इधर -उधर मत ढूँढिये ।
Saturday, 15 November 2014
संस्मरण
कभी -कभी सोचती हूँ कि वो कौन सी शक्ति है जो जगत को चलाती है ? वैसे आज विज्ञान ने इतनी उन्नति कर ली है के इंसान जो चाहे कर सकता है ,फिर भी जीवन में कुछ ऐसे क्षण आते है कि हम सोचने पर मजबूर हो जाते है कि कोई तो शक्ति मौजूद है ।
बात उन दिनों की है जब हम पोरबंदर में रहते थे। हमारे घर कुछ मेहमान आये हुए थे । उनको वहां से कुछ चीजे खरीदनी थी तो करीब शाम को चार बजे उन्हें लेकर मैं बाजार गई ।जहाँ से उन्हें खरीदारी करनी थी वो एक छोटी सी गली थी । मै उन्हें लेकर उस गली में घुसी ही थी कि अचानक सामने से दो सांड न जाने कहाँ से दौड़ते हुए आये और दोनो तरफ से मुझे घेर लिया ।हम तीन लोग थे , पर मैं बुरी तरह से उनकी चपेट में आ चुकी थी चारों तरफ भीड़ जमा ही गई । किसी में हिम्मत नहीं थी के उन सांडों को हटा सके ।दूसरी तरफ उन्होंने अपने सींगों में उठा-उठा कर मुझे फुटबॉल की तरह उछलना शुरू कर दिया लगभग छे-सात बार , और अपने नुकीले सींगों से प्रहार शुरू कर दिए । मुझे तो साक्षात् मौत के दर्शन हो रहे थे । लोग अभी भी चिल्ला रहे थे । लेकिन कोई मदद नहीं ।
अचानक कुछ देर के बाद अपने आप ही वे शांत होकर चले गए । मैं अपने आप उठी और अपनी चप्पलें ढूँढने लगी । लोग बातें करने लगे कि कुछ दिनों पहले भी एक भाई के साथ ऐसा ही हुआ था ,पर वो बच नहीँ पाए ।
मुझे अभी तक कुछ समझ नही आ रहा था कि आखिर मेरे साथ हुआ कया ?
हमारे मेहमान मुझे सीधे अस्पताल ले गए ।मेरे घर पर भी उन्होंने सूचना दे दी ।सब लोग बड़े चिंतित हो गए । जिस तरह की घटना थी सब यही कल्पना कर रहे थे की क्या हाल होगा मेरा ।
लेकिन क्या बताऊँ मैं आपको इतना होने के बाद भी एक भी खरोंच नहीं आई ।
अब इसे मै क्या कहूँ ये आप ही बताइये ।
Friday, 14 November 2014
स्वास्थ्य और संगीत
करताल के साथ कीर्तन हो या कव्वाली की महफ़िल,शास्त्रीय संगीत हो या सुगम संगीत की मधुर सुरावली ,फ़िल्म का कोई दर्दभरा गाना हो _संगीत सभी को अच्छा लगता है ,इसका जादू है ही ऐसा ।
बहते झरने का कलकल ,कोयल की मधुर आवाज,वर्षा ऋतु में मोर की मधुर ध्वनि ,समुद्र से उठते मौजौ की आवाज ये सब संगीत ही तो है ।सुरीला मधुर संगीत सभी के मन को आनंदित कर देता है ,अप्रतिम शांति प्रदान करता है ।
इसके विपरीत लय बिना की आवाज ,शोरगुल शरीर के लिए नुकसानदायक होता है । इस प्रकर का संगीत शरीर को अनेक प्रकार से नुकसान पहुंचता है । अगर हम अपने हृदय की धड़कन की ध्यान से सुने तो क्रमशः एक -दो -तीन आवाज सुनाई देती है इसी प्रकार लय-ताल में अगर संगीत बजता हो वो हमरे अन्तर्मन् को स्पर्श करता है और एक अदभुत आनंद की अनुभूति होती है ।
जब कभी हमारा मूड खराब हो,मन बैचेन हो,कुछ करना अच्छा न लगता हो तब कोई भी पसंदीदा गीत सुनने से मन का ,उद्वेग शांत हो जाता है ।
तो चलिए अपने जीवन को संगीतमय बनाये और जीवन को और मधुर बनाएं ।
Wednesday, 24 September 2014
चक्कर लाइक का
आजकल फेस-बुक ,वाटस एप का भूत सभी पर इस कदर चढ़ा हुआ है कि पूछिये मत । अरे
कल तो मेरे सामने ही एक भाई खडडे में जा गिरे और हाथ -पैर तुड़ा बैठे ।वो बड़ी तल्लीनता से फोटो देख रहे थे फेस बुक पर ।
अगर कोई फेस बुक पर नही होता तो भैया वो तो एकदम पिछड़ा हुआ समझा जाता है ।हमनें भी सोचा भला हम भी क्यों पीछे रहें ,तो बना डाला अपना प्रोफाइल और आ गए फेसबुक पर । और भैया तब पता चला कि हम क्या मिस कर रहे थे । दो दिन में तो इतने मित्र बन गए जितने हम अपनी पचास साल की उम्र में नहीं बना पाए थे ।
हमनें भी आनन -फानन डाल दिये अपने बहुत सारे फोटो ,और रोज यही देखते कि कितने लोगों ने लाइक किया ।अब तो हमारा अधिकांश समय इसी में गुजरने लगा ।
और ये लाइक का चककर बड़ा गजब का है । एक दिन हमनें देखा किसी की मृत्यु की खबर थी भाई , बीस लाइक । अब इससे अधिक और कया कहें ।
खैर अब तो हमें भी इसका चस्का लग चुका था ।सोचा चलो हम अपने लेखन का शौक भी यहां पूरा कर सकते हैं सो बन गए" ब्लौगर " ।
एक सप्ताह में दो-तीन रचनाएँ पोस्ट कर दी ।अब हमारा पूरा ध्यान लाइकस देखने में ही लगा था । पहली रचना पर ही सात लाइकस । मारे खुशी के खुद ही फूले जा रहे थे ।हमनें सोचा चलो इन मित्रों को फोन करके ही धन्यवाद देतें है । हमने फोन किया और धन्यवाद दिया ,पर सामने से जवाब आया -"अरे वो तो तुम्हारा नाम देखकर ही लाइक कर दिया ,वरना पढता कौन है " । हम तो जवाब सुन कर सन्न रह गये अब इतनी हिम्मत शेष नहीं थी कि किसी और को फोन किया जाए ।
पर हम भी लिखना छोडेंगे नहीं कभी न कभी तो सही में "लाइक " मिलेगा ।वैसे आप भी कर सकते हैं लाइक ।
Wednesday, 23 July 2014
मन
उड़ चल रे मन ,
कर ले उन सपनों को पूरा ,
बुने थे जो तूने कभी ।
मत देख आसमाँ को ,
बंद कमरे की खिड़की से ,
चल, बाहर निकल और
देख खुले आसमाँ को
तोड़ दे सीमाओं की जंजीरों को ,
चल निकल ,कर ले कुछ स्वपन तो पूरे ।
न लड़ इच्छाओं से , बस लड़ ले बाधाओं से
आगे बढ ,बढता चल ,बढता चल ।
Tuesday, 22 July 2014
योगा वॉक
कहते हैं न कि चलना सबसे अच्छी कसरत है ।
आज मैं बात कर रही हूँ योगा-वॉक की । इस पद्धति के द्वारा न केवल शारीरिक अपितु मानसिक स्वस्थता भी प्राप्त की जा सकती है ।
शुरुआत तेज चलने से करें । फिर सोचें -
आज किस बात पर गुस्सा किया ,फिर उसे जमीन में दफना दो ,पैरों से कुचल दो । स्वयं को गुस्से से मुक्त कर दो ।
चलते समय अपने दुख को बाहर करें ।
कंधों को घुमाइये ,इससें कंघों की अकङन कम होगी ।
धरती मॉ को धन्यवाद दे ।
किसी को सकारात्मक वाक्य कहें ।
इससे खुशी, मानसिक शांति और एनर्जी मिलती है ।
अपने आप को अच्छा स्वस्थ्य दे ,अपने स्वस्थ्य के मालिक स्वयं बनें ।