Tuesday, 24 December 2013

मुद्रा विज्ञान

हमारा शरीर पाँच तत्व से बना है । जो है -अग्नि,वायु, आकाश,पृथ्वी और जल । हमारी पाँचों उंगलियाँ इन तत्वों का प्रतिनिधित्व करती हैं । जो इस प्रकार हैं-
     अंगूठा --- अग्नि
      तर्जनी ---वायु
       मध्यमा--- आकाश
        अनामिका--- पृथ्वी
         कनिष्ठिका ---जल
       हमारे हाथों में से एक विशेष प्रकार की उर्जा निरंतर निकलती रहती है । विभिन्न उँगलियों द्वारा की जाने वाली  मुद्राओं से शरीर में स्थित चेतना शक्ति केन्द्रों को जाग्रत किया जा सकता है ।
     पाँच तत्वों के संतुलन से हम स्वस्थ्य रह सकते हैं । मुद्रा दोनो हाथो से करनी चाहिए ।इन्हें करते समय उँगलियों और अंगूठे का स्पर्श सहज होना चाहिए । मुद्राएँ पंद्रह- पंद्रह मिनट
सुबह -शाम की जा सकती  हैं ।
     मुद्राओं के अभ्यास से व्यक्तित्व का विकास होता है ।ज्ञानमुद्रा,प्राणमुद्रा,पृथ्वी मुद्रा,कोई भी साधक इच्छानुसार कर सकता है ।बाकी की मुद्राएँ विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार करनी चाहिये । यहाँ मैं कुछ प्रचलित मुद्राओं का विश्लेशण आवश्यक समझती हूँ ।

   
     
  
पृथ्वी मुद्रा-यह मुद्रा अंगूठे पर अनामिका की टोच लगाकार बाकी उँगलियोँ को सीधा रखने से बनती है । पृथ्वी तत्त्व की कमी से शारीरिक दुर्बलता को यह दूर करती है ।
आकाश मुद्रा-यह मुद्रा अंगूठे पर मध्यमा की टोच लगाकार बाकी की उँगलियों को सीधा रखने से बनती है । यह मुद्रा हड्डी संबंधी रोगों मे फायदेकारक है । मध्यमा का ह्रदय से संबंध होने से ,संबंधित रोग में फायदेकारक है ।
ज्ञान मुद्रा-यह मुद्रा अंगूठे पर तर्जनी की टोच यानी ऊपरी सिरा लगाकर बाकी कीउँगलियों को सीधा रखने से बनती है । यह मुद्रा मस्तिष्क के ज्ञान तंतुओं को क्रियावान बनाती है ।अनिद्रा रोग के लिए तो यह रामबाण है ।

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