Tuesday, 5 July 2016

लोग


    बंद किवाड़ों की
    दरारों से झाँकते लोग
     दिवारों से कान लगा कर
      कुछ सुनते -सुनाते लोग
      फिर, लगाकर नमक - मिर्च
      किस्से घडते - घड़ाते लोग
       शब्दों के अभेद्य
     बाण चला कर
    दिलों को तार -तार
     कर जाते लोग
       न सोचे , न समझें
    बस , सुनी -सुनाई पर
     एक दम राय
    बनाते लोग
    कभी  हँसते साथ
    तो कभी वो ही
     रुलाते लोग
     सामने कुछ
     पीछे कुछ और
      यही दोगलापन
      दिखाते लोग
      अपना समय
     बस ,इसी तरह
     बिताते हैं लोग
   वाह रे लोग , वाह रे लोग ।

6 comments:

  1. Excellent keep writing such poems you have very thought provoking ideas and penning them down in such simple and straight way is something which is seldom found words act as a sharp-edged knife you are unique sis love you

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  2. बहुत सुंदर शुभा जी ।

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  3. जितनी सुन्दर आप उतनी ही अच्छी ये कविता

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  4. जितनी सुन्दर आप उतनी ही अच्छी ये कविता

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  5. वाह वाह बहुत ही सुन्दर.....

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