Saturday, 16 July 2016

झूला

    एक वृक्ष कटा
     साथ ही
     कट गई
    कई आशाएँ
      कितने घोंसले
       पक्षी निराधार
       सहमी चहचहाहट
       वो पत्तों की
       सरसराहट
       वो टहनियाँ
       जिन पर
      बाँधते थे कभी
      सावन के झूले
       बिन झूले सावन
      कितना सूना
     कटा वृक्ष
      वर्षा कम
   धरती सूखी
    पड़ी दरारें
    न वृक्ष
    न झूला
   न सावन ?

                 शुभा मेहता
                   17th , July ,2016

11 comments:

  1. वाह....अतिसुन्दर लाजवाब।भाषा और शैली अद्भुत। अभिभूत हूँ तेरी प्रतिभा पर।

    ReplyDelete
    Replies
    1. This comment has been removed by the author.

      Delete
  2. अतिउत्तम शुभा जी । अभिनन्दन ।।।

    ReplyDelete
  3. धन्यवाद राजेश जी ।

    ReplyDelete
  4. वो पत्तों की
    सरसराहट
    वो टहनियाँ
    जिन पर
    बाँधते थे कभी
    बहुत उम्दा सृजन,,,, बधाई।

    ReplyDelete
    Replies
    1. धन्यवाद संजय जी ।

      Delete
    2. धन्यवाद संजय जी ।

      Delete
  5. वाह बेहतरीन कविता प्रकृति के साथ और समाज के मुँह पे
    करारा तमाचा ।।

    ReplyDelete