मैं भी बहुत खुश हो जाती ...थोड़ी बड़ी हुई तो घर में सभी मुझसे ही छोटा-मोटा काम करवानें लगे ,यह कहकर कि बड़ी सयानी है हमारी गुड़िया ..।
एक बार हमारे घर मेहमान आए जो मेरे लिए सुंदर सी गुड़िया लाए ...मैं बहुत खुश हुई । उन्होनें कहा देखो तुम -सी ही है न गुड़िया ..खेलोगी न इससे ,देखो इसे जैसे चाहो घुमा सकती हो ,नचा सकती हो ..चाबी की गुड़िया है ये तुम्हारे इशारों पर नाचेगी .......।
तभी माँ नें पुकारा गुड़िया चलो बहुत हुआ खेल ,इधर आकर काम में मदद करो हमारी ....
और उन्होनें चाबी भर दी .....।
शुभा मेहता
2nd feb 2026
सुंदर
ReplyDeleteबहुत -बहुत धन्यवाद
Deleteगुड़िया कब चाभी वाला खिलौना बन जाती है वो ख़ुद ही नहीं समझ पाती।
ReplyDeleteकितना गहरा संदेश दिया है आपकी लघुकथा ने दी।
सादर।
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नमस्ते,
आपकी लिखी रचना मंगलवार ३ फरवरी २०२६ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं।
सादर
धन्यवाद।
बहुत -बहुत धन्यवाद प्रिय श्वेता
Deleteसुन्दर लघुकथा
ReplyDeleteबहुत -बहुत धन्यवाद
Deleteचाबी भर देता है कोई और नाचता रहता है मानव, कभी थम कर देखता है तो खेल समझ में आता है, पर तब तक नाचने की आदत पड़ जाती है
ReplyDeleteबहुत -बहुत धन्यवाद
Deleteपैना और करारा व्यंग्य !
ReplyDeleteबहुत -बहुत धन्यवाद
ReplyDeleteमाँ तो भर ही देती है चाबी ...
ReplyDeleteलाजबाब
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