Wednesday, 30 September 2020

एक थी आशा

एक थी आशा ....
हँसती -गाती ,
मुस्कुराती ,सुंदर ,सलोनी -सी 
 माँ की दुलारी थी .
कितने सारे सपने थे उसके
कुचल दी गई 
 वहशी दरिंदों द्वारा
  क्या हो गया है 
  इंसान ...
इंसान से मिटकर 
बन गया हैवान है 
  रो रही है मानवता 
फूटफूट कर 
  जीत रही है ताकत 
  सत्ता की ..
पैसे की ...
 बिक रहे हैं लोग 
चंद सिक्कों की 
 खनखनाहट मे ।


शुभा मेहता 
30th Sept ,2020
  
  
  

22 comments:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 01.10.2020 को चर्चा मंच पर दिया जाएगा। आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी|
    धन्यवाद
    दिलबागसिंह विर्क

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    1. जी ,बहुत-बहुत धन्यवाद ।

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  2. एक नहीं थी कई कई थी आशायें।

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    1. जी ,बात तो आपकी सही है ..न जाने कितनी आशाएँ ..दरिन्दों की भेंट चढ जाती है

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  3. समसामयिक परिदृश्य पर मार्मिक कविता...

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    1. बहुत-बहुत धन्यवाद आपका ।

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  4. शुभा दी, न जाने हमारे समाज से यह रोग कान मिटेगा?

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  5. वेदना भीतर तक भेद रही है । आह !

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    1. जी,स्वागत है आपका मेरे ब्लौग पर ।

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  6. इंसान ...
    इंसान से मिटकर
    बन गया हैवान है
    रो रही है मानवता
    फूटफूट कर
    जीत रही है ताकत
    बिलकुल सही कहा आपने,कब रुकेगा ये घिनौना कुकर्म ?
    शरीर ही नहीं अब तो आत्मा तक छननी हो चुकी है।

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  7. बढ़िया प्रस्तुति

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    1. धन्यवाद ओंकार जी ।

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  8. सही कहा आपने। कुछ तत्व आशा को निराशा में बदलने की कोई कसर नहीं छोड़ते।

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    1. बहुत-बहुत धन्यवाद ।

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  9. Replies
    1. बहुत-बहुत धन्यवाद ।

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  10. बहुत ही सुंदर रचना। आज के परिप्रेक्ष्य में सार्थक व विचारणीय। साधुवाद आदरणीया।

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    1. धन्यवाद पुरुषोत्तम जी ।

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    2. धन्यवाद पुरुषोत्तम जी ।

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  11. भावपूर्ण अभिव्यक्ति.

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