अरे भूल हो गई ....
कुत्ता नहीं ...
" टौमी " नाम है उसका
साथ में घूमता है गाडी में
बड़े ठाठ से ...
उस दिन जैसे ही
नेता जी के साथ
गाडी से उतरा
अचानक ही
एक आम आदमी को
धर -दबोचा ...
आम आदमी दर्द से कराहता
चिल्लाया .......
काट खाया रे.. ...
नेता जी के कुत्ते नें . ..
नेता जी गुर्रा कर बोले
किसनें हिम्मत की
टौमी को कुत्ता कहने की
सा... . ला कुत्ता कहीं का ....
शुभा मेहता
6th Oct, 2024
सुन्दर सृजन
ReplyDeleteबहुत-बहुत धन्यवाद मनोज जी
Deleteसुंदर व्यंग्य
ReplyDeleteबहुत-बहुत धन्यवाद
Deleteकटु व्यंग्य
ReplyDeleteबहुत-बहुत धन्यवाद अनीता जी
Deleteबहुत सुंदर व्यंग्य
ReplyDeleteबहुत-बहुत धन्यवाद ओंकार जी
Deleteकरारा व्यंग ...
ReplyDeleteबहुत-बहुत धन्यवाद दिगंबर जी
ReplyDeleteवाह वाह बहुत सुन्दर व्यंग्य
ReplyDeleteवाह!!!
ReplyDeleteक्या बात..
कटु सत्य।
बहुत खूब करार व्यंग्य
ReplyDeleteयह कविता मुझे सीधी और तीखी चोट करती हुई लगी। आप सत्ता की भाषा, उसके अहंकार और आम आदमी की बेबसी को बहुत सहज ढंग से सामने रखते हैं। टौमी और कुत्ते का फर्क असल में नाम का नहीं, हैसियत का है, और यही बात चुभती है। आम आदमी के दर्द पर नेता जी का गुस्सा करुणा नहीं, घमंड दिखाता है।
ReplyDelete