Friday, 16 September 2022

मैं ...हिंदी .




मैं ..हिन्दी ...

कौन?????
इतना पूछकर  
कुछ किशोरों का दल 
पुनः व्यस्त हुआ  बातों में 
और मैं ..चुपचाप  खडी 
डूब गई  उनकी बातों में ।
अपने ही देश में 
 हाल देख अपना 
   रोना -सा आ गया 
   कुछ शब्द  मेरे थे 
    कुछ अजनबी से थे 
     लगा जैसे शब्दों कई खिचड़ी -सी 
      पक रही हो ..।
      अरे ,मेरा तो सौंदर्य  ही खत्म  हो गया 
       कितनी सभ्य, अलंकारों से सजी थी 
       क्या हाल बना दिया ।
       मेरी यही कामना है ..
       प्रार्थना है ....
        निज देश में मान दो ,
        सम्मान  दो ...
         बनाओ मुझे ताकत  अपनी 
          मैं तो आपके मन की भाषा हूँ  
            प्रेम  की भाषा हूँ  
              क्या दोगे अपना प्रेम  ?

शुभा मेहता 

15th September  ,2022

 

Wednesday, 13 July 2022

पीले पत्ते (लघुकथा)

ओफ्फो ....ये पीले-पीले पत्ते पौधों की सारी सुंदरता खराब कर देते हैं ।कितनी बार कहा है माली से जैसे ही पत्ते थोडे पीले होने लगे इन्हें हटा दिया करो । मैं ही निकाल देती हूँ इन्हें ।और उसने चुन चुन कर पीले पत्तों को नीचे गिराना शुरु कर दिया । 
   एक -दो पीले पत्ते उदास हो रोने लगे ।तभी उनमें से एक ने कहा उदास क्यों होते हो ..पीले हुए हैं अभी सूखे नही ..सूखने से पहले जितना समय बचा है क्यों न हँसी -खुशी बिताएँ । सभी पीले पत्तों ने घेरा बनाया और नाचने गाने लगे ,हँसने ,गुनगुनाने लगे ..साथ -साथ रह कर साथ निभाने लगे ।अब कोई ना उदास था ना पीले होने का गम ..।


शुभा मेहता 
13July ,2022


Wednesday, 18 May 2022

कुछ अनकहा ...

कुछ अनकहा सा ...
 रह जाता है 
  जिंदगी यूँ ही 
   गुज़रती जाती है 
  उस अनकहे की टीस 
   सदा उठती रहती है 
    क्यों रह जाता है 
    कुछ अनकहा ...
     काश , कह दिया होता 
      ये टीस तो न उठती 
       जो होता देखा जाता 
         ये दर्द तो ना मिलता 
           शायद मिला ही नहीं 
          कोई हमज़ुबाँ ..
           या कभी सोचा ही नहीं
           कि कह डालें .....
             ये अनकहा ....
              अब कहाँ......
              शायद ...साथ ही 
            ले जाएँगे ये अनकहा .....।

      शुभा मेहता 
  19th May ,2022

Sunday, 8 May 2022

बस....अब और नहीं

बस ,अब और नहीं 
  आखिर सीमा होती है 
  हर चीज की .....
   पीछे मुडकर देखती हूँ 
   तो सोचती हूँ 
  क्या पाया अब तक जीवन में
   दौडती रही ,भागती रही 
    कभी इसके लिए 
  कभी उसके लिए 
   और मेरे सपने 
     उनका क्या ?
    देखे तो थे 
    कई सपने ....
    मुक्त गगन में 
    उडना चाहा था 
     छूना चाहती थी 
      आसमान ....
     पर समाज की सोच ...
      लडकी हो .....
       क्या करोगी उडकर ..
        लडकी हो ..धीरे बोलो 
         लडकी हो झुककर चलो 
         करना क्या है 
          ज्यादा पढकर ..
          आखिर बनानी तो 
           रोटियाँ ही हैं.....
           पर बस अब और नहीं 
            थक गई हूँ एक पाँव पर 
             नाचने -नाचते .......
              तो भई करना क्या चाहती हो ?
               सपने पूरे करना और क्या 
            क्या......पागल हो गई हो 
            अपनी उम्र तो देखो ..
             नहीं ..बस अब और नहीं 
               अब कोई फर्क नहीं पडता 
                कोई क्या कहेगा 
                ठान लिया है अब तो 
                जो करना है कर के रहूँगी 
                 बहुत जी लिया डर -डर के 
                  अब तो मनमर्जियां करूँगी ।



शुभा मेहता 
  9th May ,2022
                     

    


Monday, 2 May 2022

माँ ...

माँ........
मेरी क्या बिसात 
जो लिख पाऊं कुछ 
तेरे लिए ,तेरे बारे मेंं
तू तो है मेरी जीवन धार 
ये मेरा जीवन है 
तुझ पर निसार 
 मन तो अभी भी करता है 
  तेरी गोद में सोने का 
   मैं करूँ बदमाशी और तू 
    डाँट लगाए ...
    तेरी तो वो डाँट भी लगती 
      बहुत मीठी सी ...
        और गुस्सा होते -होते 
         जो तेरा हौले से मुस्कुराना 
         फिर बैठा अपनी गोद में 
         प्यार से सहलाना 
          माँ तू तो है ही 
           कितनी प्यारी 
           मेरी क्या बिसात 
           जो लिख पाऊँ कुछ 
            तेरे बारे में ।

    शुभा मेहता 
     3rd May ,2022


Friday, 29 April 2022

मजदूर (लघुकथा )

"पापा ये मजदूर कौन होते है "?नन्ही रानी नें अपने पापा से प्रश्न किया ।
बेटा, जो दिनभर मेहनत करते है ,मजदूरी करते हैं ।जैसे बोझा उठाना ,घरों में काम करना और भी बहुत से काम ।
वो देखो सामनें घर बन रहे हैं न ,देखो.... बहुत से लोग सिर पर ईँट ;पत्थर लिए इधर  से उधर जा रहे हैं वो सब मजदूर हैं।ये लोग दिनभर मेहनत करते हैं और पैसे कमाते है और अपना जीवन चलाते हैं।
 अच्छा .......इसका मतलब माँ भी मजदूर है वो भी दिनभर सबका काम करती है, डाँट भी खाती है ,पर उसे तो कभी पैसे नही मिलते ।
 वो अलग तरह की मजदूर है क्या ?

शुभा मेहता 
30th April ,2022

Thursday, 21 April 2022

धरती माँ

आओ ,आज सब मिलकर 
माँ ,धरती का सम्मान करें 
 आभारी हों ,दिल से ...
  भूल गए हैंं शायद .
  अपने स्वार्थ में हो गए हैं 
  इतने अंधे ...
   देखो ध्यान से इसकी सुंदरता को 
     बहते झरनों को ,नदियों को,
      फूलों को ,पेडों को 
      घास पर पडी उस एक ओस बूँद को 
       कितनी खूबसूरत है 
         मिट्टी की खुशबू 
          माँ को सजाएँ ....
         हरी -हरी चुनरी पहनाएँ
          देती आ रही सदियों से वो जो हमें
       आओ मिलकर कर्ज चुकाएँ ।

शुभा मेहता 
 21st April ,2022