Sunday, 31 January 2016

प्रतीक्षा

    कब से खड़ी
    झरोखे से
     बाट निहारूँ
     कहाँ हो तुम
     और ये चाँद निर्मोही
    देखो  मुझे देख
     कैसे मुस्कुरा रहा है
     जैसे चिढ़ा रहा है
      कह रहा है
     मैं तो रहता साथ
    सदा चाँदनी के
     मैं हूँ तो वो है
     बने एक दूजे के लिए
    मैं भी क्या कहूँ
   कहाँ हो तुम ?
    आँखे पथरा गई
    राह तकते -तकते
      पथराई सी
     ना जाने कब
    बन्द हुई
      और फिर सपने में
      तुम आये , बाहें फैलाये
     और मैं खिंची सी चली गई
      चलती ही गई
     पा ही लिया तुम्हे
      सपना ही सही
      ख़ुशी दे गया
    जब आँख खुली
    खिड़की से चाँद
   अभी भी मुस्कुरा रहा था .......
    

6 comments:

  1. धन्यवाद प्रदीप जी । स्वागत है आपका मेरे ब्लॉग पर ।
    आभार ।

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  2. धन्यवाद प्रदीप जी । स्वागत है आपका मेरे ब्लॉग पर ।
    आभार ।

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  3. अच्छी कविता। शुभकामनाएं।

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  4. अच्छी कविता। शुभकामनाएं।

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  5. धन्यवाद अरुणजी । स्वागत है आपका मेरे ब्लॉग पर ।

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