मुफ्त ....मुफ्त ..मुफ्त ....
खुशियाँ लो ...
और बाँटो..
सारे जहाँ को
कोई दाम नहीं
बस थोड़ा सा प्रेम
थोड़ी सी ममता
थोड़ी सी करुणा
बस इतना ही . ..
बस दो इंच खोल अधरों को
ज़रा मुस्कुरा दो .....
वैसे तो लेने
मुफ्त की चीज़
कैसे दौड़ते हो
धक्का-मुक्की
करते हो ...
नफरत और घृणा का तो
दाम चुकाना पड़ता है
किसी की जान जाती है
जलता किसी का आशियाना
क्या हासिल होता है
कुछ पता नहीं
मुफ्त ..मुफ्त ..मुफ्त
खुशियाँ लो.....।
शुभा मेहता
7th April ,2010
Adbhut advitiy aur teri shreshth kavitaon ne se ek tera manvik paksh bahut bhali bhanti darshata hai aaj ke aise hatred bhare mahaul me ye ek aas ek urjaa aur khushnuma mahaul rachne ka prayaskrbe ki prerna pradan krti hai dher dher pyaar aur sneh ashish 👏👏👏👏💐💐💐😊😊😊😘😘😘😘
ReplyDeleteइतनी सी बात समझ ले इंसान जो जीना सरल हो जायेगा ...
ReplyDeleteपर मुफ्त जो है ख़ुशी कोई लेना नहीं चाहता ... चूका कर नफरत भी ले लेता है ...
बहुत - बहुत आभार ।
Deleteजिंदगी जीने का सही सार बताया हैं, शुभा दी आपने।
ReplyDeleteधन्यवाद ज्योति।
Deleteसटीक रचना
ReplyDeleteबहुत ख़ूब 👌
ReplyDeleteसादर
बहुत सुंदर रचना सखी 👌
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