Wednesday, 23 August 2023

पाती

मेरे लिए  वो महज 
कागज का टुकडा नहीं था 
 दिल निकाल  कर रख दिया था मानों 
  एक -एक शब्द  प्रेम रस में पग़ा  था
   प्रेम  की ही स्याही थी 
     कलम भी प्रेम की...
     शब्दों को प्रेम रस में 
     डुबो -डुबो कर 
      बड़े जतन से 
      उस कागज पर 
      सजाया था 
        पता नहीं 
        तुमने पढा भी 
        या नहीं 
         या उडा दिया 
         चिंदी-चिंदी 
         हवा का रुख 
         जिधर था ......

शुभा मेहता 
23rd Aug ,2023
         

17 comments:

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    1. बहुत-बहुत धन्यवाद आदरणीय जोशी जी

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  2. सुंदर सृजन

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    1. बहुत-बहुत धन्यवाद अनीता जी ।

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    1. बहुत-बहुत धन्यवाद अरुण जी

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  4. प्रेम के अहसास की खूबसूरत रचना

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  5. बहुत-बहुत धन्यवाद ज्योति जी ।

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    1. बहुत-बहुत धन्यवाद दीपक जी

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  7. बहुत बढ़िया, शुभा दी।

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    1. बहुत-बहुत धन्यवाद ज्योति

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  8. प्रेम की सुन्दर पाती ... हवा में भी खुशबू बिखेर रही होगी ...

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  9. बहुत-बहुत धन्यवाद दिगंबर जी

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  10. प्रेम को प्रेम की चाह होती है। बहुत अच्छी रचना

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