शब्द ...
प्रस्फुटित होते हुए
धीरे -धीरे
ले रहे आकार
एक रचना का
टेढ़े -मेढ़े
छोटे ;बड़े
सभी तरह के
शब्द ... .
दिलो -दिमाग पर छाये
ऊपर -नीचे हो रहे
किस शब्द से
शुरुआत करूँ
बन जाये
गीत एक
संगीत एक
ले रहा आकार
जहन में
धीरे -धीरे
कह रहा
चुपके से
ढाल दो
हमें भी
संगीत में ।
Sunday, 15 May 2016
शब्द
Saturday, 23 April 2016
किताबें
वो कहते हैं कि
नहीं बेहतर
दोस्त कोई
मुझ जैसा
जिसने भी की
दोस्ती मुझसे
वो हमेशा
सुख पाया
अरे नहीं पहचाना?
मैं हूँ किताब
पर आजकल
हो गई हूँ जरा
एकाकी
लोगों को हो गया है
जरा कम मुझसे लगाव
पड़ी रहती हूँ
रैक पर , उपेक्षित सी
क्योकि आजकल
मेरी जगह है
इंटरनेट, टीवी
कुछ लोग सिर्फ
दिखावे के लिए
सजाते है मुझे
कुछ लोग
बेच डालते है
रद्दी में
मुझ में संचित
ज्ञान के बदले
कुछ पैसे पाकर
खुश हो लेते
थोडा इत्मिनान है
कुछ लोग तो हैं
अभी भी
जिन्हें है मेरी क़द्र
जो चाहते है
अभी भी मेरा साथ
चलो इसी बात से
मैं खुश हूँ
मैं हूँ किताब .........
माँ धरा
हे माँ धरा
कहाँ से लाती हो
इतना धैर्य
कैसे सह लेती हो
इतना जुल्म
इतना बोझ
इतना कूड़ा -कचरा
करते हैं हम मानव
अपनी माँ को
कितना गन्दा
फिर भी बदले में
देती हो तुम
मीठे फल ,अनाज
हरे भरे वृक्ष
उनकी छाँव
समेटे रहती हो
सदा सबको
अपने ममता के
आँचल में
फिर क्यों हम
तेरे सब बच्चे
करते इतना
जुल्म तुझ पर
काटते पेड़ों को
पर्वतों को
पर अब हमे
सम्भलना होगा
करनी होगी
तेरी हिफाज़त
प्रेम से
करें सब आदर जो तेरा
रखें सब तुझे
स्वच्छ ,सुंदर
कमसे कम
एक एक पेड़
लगाये सभी
करे जतन उनका
तभी बन पायेगी
माँ धरा स्वर्ग सी ।
रेशमी रजाई
छोटी थी तब
माँ ने इक दिन
एक कहानी सुनाई थी
थी जिसमे एक राजकुमारी
ओढ़े जो रेशमी रजाई
बस तभी से उसने भी
चाही एक रेशमी रजाई
ओढ़ जिसे वो भी
बन जाये राजकुमारी सी
रोज़ स्वप्न में बन जाती
वो राजकुमारी
होती थी सपने में
उसके पास भी
रेशमी रजाई
पर जब उठती
पाती पैबंद अपनी
पुरानी रजाई पर
मन मसोस कर रह जाती
काश , सच्ची -मुच्ची
होती उसकी भी
एक रेशमी रजाई
Wednesday, 30 March 2016
यथार्थ
मुट्ठी में बंध रेत
खिसक रही है
धीरे -धीरे
बना रही है
कुछ निशाँ
शायद अपना नाम
लिख रही है
पढ़ रही हैं उसे
अचानक , तेज
लहर ने आकर
मिटा दिया
वो नाम , वो निशाँ
कुछ न था शेष
खोली मुट्ठी
तो पाया
हाथ रीता
न नाम न निशाँ ।
Tuesday, 22 March 2016
होली
Wednesday, 16 March 2016
यादें
यादें कभी भी
चुपके से आकर
गुदगुदाती हैं मन को
रखा है सहेज कर
दिल के कोनों की
किसी बंद अलमारी मे
सहसा खोल दरवाज़ा
हौले से झाँक लेती हैं
और कभी दे जाती हैं
होठों पर एक मधुर मुस्कान
कभी अकेले में
खिलखिलाहट
कोई खट्टी कोई मीठी
औऱ कभी भिगो जाती हैं
कपोलों को अश्रु धार से
यादें ........