बचपन ,भोलापन ,निष्फिक्र
गाना ,नाचना ,हँसना ,रोना
सब कुछ कितना प्यारा
जैसे जैसे उम्र बढी़
ये सब बातें कब भूल गए
एहसास ही न हुआ
भूल गए वो पल
जो बचपन में जिये
न जाने कहाँ गया वो भोलापन
फिर दौडने लगे
पैसे और स्टेटस की अंधी दौड़ में
कब किसका दिल दुखाया
एहसास ही न हुआ
परवाह नहीं कि
किसके आँसू बहे
वो रिश्तों की गरमाहट
खो गई इस अंधी दौड़ में ...।
शुभा मेहता .
Wah kitne sahaj sundar bhavon ko itni saralta se vyakt krti h tu bahut khoob khoob likh khush rah mast rah sukhi ho dher saara pyaar 😘😘😘😘😘😘😘
ReplyDeleteइसलिए कहते हैं बच्चा बने रहना सब से अच्छा ...
ReplyDeleteइस भौतिक सुख की दौड़ में इंसान खो गया है ... कहा है वो ...
सुन्दर रचना है ...
बहुत बहुत धन्यवाद दिगंबर जी ।
Deleteवाह !!! शानदार रचना
ReplyDeleteधन्यवाद नीतू जी ।
Deleteबिलकुल सही शुभा जी वो रिश्तों की गर्माहट आधुनिकता की अंधी दौड़ में कहीं खो सी गयी है
ReplyDeleteधन्यवाद रितु जी ।
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