Thursday, 10 September 2026

बिट्टू और गणपति


गली में उत्सव की तैयारियाँ पूरे जोर-शोर से चल रही थीं। रंग-बिरंगी झालरें, बड़े-बड़े पोस्टर और ऊँची आवाज़ में बजता संगीत—हर तरफ उत्सव का माहौल था।

मंडप के सामने चंदा इकट्ठा करने वालों की भीड़ लगी थी। तभी दस साल का बिट्टू अपनी गुल्लक लेकर वहाँ पहुँचा।

“काका, इसमें मेरे पूरे पाँच सौ रुपये हैं। गणपति जी के लिए रख लो।”

काका ने मुस्कुराकर पैसे ले लिए।

अगले दिन बिट्टू ने देखा कि पास की झुग्गी में रहने वाली एक बुज़ुर्ग अम्मा भूखी बैठी थीं। उनके घर में चूल्हा नहीं जला था।

बिट्टू तुरंत घर गया और अपनी माँ से बोला, “माँ, आज गणपति जी को भोग लगाने से पहले अम्मा के लिए खाना बना दो।”

माँ ने पूछा, “लेकिन बेटा, गणपति जी के लिए तो प्रसाद बनाना है।”वह मासूमियत से बोला, “माँ, गणपति जी तो कहते हैं न कि सबमें भगवान हैं। अगर अम्मा भूखी हैं, तो क्या गणपति जी खुश होंगे?”

माँ की आँखें नम हो गईं।

उस दिन घर का पहला भोजन अम्मा के घर पहुँचा।

शाम को मंडप में आरती हो रही थी। बिट्टू चुपचाप गणपति की मूर्ति के सामने खड़ा था।

उसे लगा जैसे गणपति बप्पा मुस्कुराकर कह रहे हों—

“मुझे फूलों से ज्यादा वह भोजन प्रिय है, जो किसी भूखे के पेट में जाए।”

उस दिन बिट्टू समझ गया कि गणपति उत्सव केवल मूर्ति सजाने का पर्व नहीं, बल्कि इंसानियत को सजाने का उत्सव है।