कहते हैं न कि जैसा मन वैसा तन अर्थात शरीर और मन की स्वस्थता एक दूसरे पर निर्भर हैं ।जैसे हमारे विचार व भावनाएं होगी तदनुरूप ही हमारे शरीर का गठबंधन होगा । सकारात्मक विचार व भावनाएं शरीर को नरम और स्वस्थ बनाकर आकषर्ण प्रदान करते हैं जबकि नकारात्मक विचार और भावनाएं इसे संकुचित करके कठोरता प्रदान करते हैं ।
हमारे शरीर का हर एक अंग अलग-अलग विचारों और भावनाओं को प्रदर्शित करता है जैसे शरीर का आगे के भाग से क्रोध, आभार ,दुख, प्रेम,आनंद,इर्ष्याआदि भावों का प्रतिबिम्ब पड़ता है ।
हम जिन प्रश्नों को छुपाना चाहते है या उनका निवारण न चाहते हों ऐसी सभी भावनाओं का संग्रह शारीर के पिछले भाग में होता हैं ।
नाक सुगंध की पहचान करने वाले भावों को दर्शाता है ।इसका सीधा संबंध ह्रदय के साथ होता है ।
गरदन पर विचारों और भावनाओं का दबाव पडने से वह अकड जाती है ।
शरीर में रोग होने के मुख्य मानसिक कारण है -निंदा, गुस्सा, रोष आदि ।
जीवन में जो अच्छा है अथवा अशांति है दोनों ही हमारी मानसिक विचारधारा पर आधारित हैं । इसलिये हमें चाहिए कि नकारात्मक विचारों को छोड़कर नये विचारों को अपनाएं । और इस सकारात्मकता की सरल पद्धति को अपना कर स्वस्थ रहे ।
Wednesday, 2 July 2014
शरीर में मनोभावों का संग्रह
Saturday, 21 June 2014
आनन्द
सकारात्मक सोच का हमारे स्वास्थ्य के साथ घनिष्ठ संबंध है । पर कुछ शब्द हमारे जीवन में ऐसे घुस गए है और हमारी सकारात्मकता में बाधक बन जाते हैं ।
आज मैं बात करूँगी उस शब्द की जिसका उपयोग जाने-अनजाने में दिन भर में कितनी ही बार करते हैं -बोर होना अथवा मन न लगना । और ये शब्द हमें ले जाता है नकारात्मक सोच की तरफ ।
बड़े तो बड़े ,छोटे-छोटे बच्चे भी कहते सुनें जाते हैं कि हम 'बोर' हो रहे है ।(शायद उन्हें इस शब्द का अर्थ भी मालूम नहीं होगा ) ।
कितनी बार तो हम पहले से ही मन में सोच बना लेते है ,कि इस जगह अथवा काम में
मजा नहीं आएगा । और इस तरह हम स्वयं तो परेशान ,उदास रहते ही है ,साथ वालों को भी परेशान कर देते है ।
कुछ लोग होते है जो अपनी उपस्थिति से वातावरण को खुशहाल बना देते हैं । ऐसे लोगों का साथ सबको अच्छा लगता है । ऐसे लोग जिदंगी को खुल कर जीते है ।पर कुछ लोग जिदंगी का आनंद नहीं उठाते ।हर समय चिंता ,परेशानी से घिरे हुए ।
अरे ,जिंदगी एक बार मिली है हँस-खेल कर गुजारें और 'बोर होना 'शब्द को तो जीवन से निकाल ही दीजिए ।
enjoy ur life .
Thursday, 5 June 2014
पर्यावरण दिवस
हर साल आज के दिन यानी पाँच जून को विश्व पयार्वरण दिवस के रूप में मनाया जाता है । वो शायद इसलिये कि सदियों से हम पृथ्वी के द्वारा दिए गए अनमोल उपहारों -पेड़-पौधे नदियाँ, जंगल आदि का दुरुपयोग करते है ,तो हमें याद दिलाने के लिए कि हम अपनी धरती माँ की अच्छी तरह देखभाल करें ।
हम केवल कहते है कि धरती माँ तुझे प्रणाम ,पर क्या सही अर्थ में हम धरती माँ का आदर करते हैं ,शायद नहीं ।
हम तो इसे गंदा करने की जैसे होड में लगे हैं । नदियों का पानी प्रदूषित हो रहा है ,जंगल कम हो रहे है ।
आओ आज संकल्प करें ,पर्यावरण की रक्षा करें ।अपनी धरती माँ की अच्छी देखभाल करें ।अधिक पेड़ लगाएं ।क्योंकि -
बूंद-बूंद पानी की है अनमोल ,पत्ती-पत्ती वृक्षों की है अनमोल ।
Thursday, 29 May 2014
योग व स्वस्थ्य
अस्थमा रोग में सूर्यनमस्कार के लाभ -
सूर्यनमस्कार के नियमित अभ्यास से श्वसन क्रिया की कार्य क्षमता बढ जाती है ,और अस्थमा के हमले पर नियंत्रण किया जा सकता है ।और क्रमश: इसके निरंतर अभ्यास से इसे जडमूल से मिटाया जा सकता है ।
इसके अभ्यास से श्वसननलियाँ विकसित होकर विपुल मात्रा मे प्राणवायु अंदर लेती हैं जिससे छोटी से छोटी रक्त वाहक कोशिकाएं श्वसन कार्य खूब अच्छी तरह से कर सकती हैं ।
सूर्यनमस्कार की क्रिया में बारह विविध स्थितियां आती हैं और हर एक स्थिति में सूर्य के बारह नामों में से एक का उच्चारण किया जाता है ।एक नमस्कार मे क्रमश: नमस्कारासन,पर्वतासन,हस्तापदासन,एकपादप्रसरणासन,भूधरासन,अष्टांगप्रणिपातासन,भुजंगासन, भूधरासन,एकपादप्रसरणासन,हस्तपादासन व नमस्कारासन किये जाते है ।
इसका अभ्यास जानकार के निर्देशन में ही करना चाहिए
सत्संग
सत्संग ,वैसे तो इस शब्द में ही अर्थ छुपा हैं ।सरल भाषा में अगर कहें तो अच्छी सगंत । वो कहते है न कि जैसा संग वैसा रंग । अगर लोहे को कुछ समय के लिए चुंबक के पास रखा जाए तो उसमें भी चुंबकत्व आनें लगता है । एक सडा हुआ फल अपने पास रखे सभी फलों को सडा देता है ।
जब दो या अधिक व्यक्ति एक साथ कुछ समय बिताते हैं तो धीरे-धीरे उन पर एक दूसरे की आदतों का असर होने लगता है । क्योंकि जब बार-बार एक ही व्यक्तिसे मिलना होता है तब प्राण,श्वास का आदान -प्रदानहोता है और हमारी "औरा' के रंग में परिवर्तन दिखाई देता है जैसे पीला जब नीले से मिलता है तो हरा रंग बनता है ,और यही पीला जब काले रंग से मिलता है तो भूरा बन जाता है । कहने का अर्थ यह है कि संगत का असर पडने लगता है ।
अब मैं बात करना चाहूँगी उस सतसंग की जो अधिकतर महिलाएं अपने मोहल्लों अथवा सोसायटी में करती हैं जिसमें एक -आध घंटे सकारात्मक विचारों ,अच्छे व्यवहार आदि पर विचार व्यक्त किए जाते है ।लेकिन उनका असर कितने लोगो पर होता है ?जैसे ही बाहर निकले वही सास-बहू के किस्से या बुराई अभियान शुरू ।
इसीलिए हमेशा दूसरों के प्रति आदर भाव रखे ,अपना काम प्रामाणिकता से करें यही सच्चा सतसंग है
Thursday, 22 May 2014
अनुभव
जब वह डाक्टर के पास पहुँचा तो देखा बड़ी लम्बी कतार थी ।पर उसनें तो समय लिया था फिर भी अभी तक उसका नंबर नही आया था ।उसके पास इंतजार करने के सिवाय कोई चारा नहीं था । पिछले कई दिनों से वह सिर दर्द ,पैरों में दर्द ,पेट की तकलीफ से परेशान था ।
आज यहाँ बैठे-बैठे उसे माँ की बातें याद आ रही थी ।वह अक्सर कहती थी बेटा शरीर का ध्यान रखा करो ,थोडा चला करो ,कुछ व्यायाम,योगा किया करो ।और मैं कहता कि तुम नही समझोगी काम ही इतना होता है ,कितना स्ट्रेस होता है इन सब चीजों के लिए कहाँ समय होता है ।तब माँ कहती "बेटा, अभी कुछ समय निकालोगे तो जिदंगी में स्वस्थ्य रहोगे ' पर उस समय मैंने उनकी बातों पर ध्यान ही दिया । माँ हमेशा यही कहती कि अगर तुम्हारा स्वास्थय अच्छा रहेगा तो हर काम अच्छी तरह से कर पाओगे ।
और तभी उसका नंबर आ गया । डाकटर साहब ने जाँच कर तरह -तरह की दवाइयाँ दी और साथ में ढेरों हिदायतें ।
उसने तो निश्चय कर लिया कि कल से ही सुबह जल्दी उठकर थोड़ा चलना है फिर थोड़ा योगा,व्यायाम आदि । माँ सच ही कहतीं थी
सच ही है पहला सुख निरोगी काया ।
तो आप कब से शुरू कर रहे हैं ।
Saturday, 10 May 2014
माँ
ऐ माँ तू कितनी अच्छी है ...प्यारी-प्यारी है ।
माँ तो होती ही ऐसी है ।इस सृष्टि का सबसे अद्भुत ,सुंदर रूप ।
माँ तो वो होती है जो खुद गीले में सोकर अपने बच्चे को सूखी जगह पर सुलाती है ,बीमार होने पर रात-रात भर जागती है । आज भले ही डाइपर और रेडीमेड खाने के जमाने में माँ को गीले में नहीं सोना पड़ता पर माँ तो माँ ही होती है । आज के इस स्पर्धात्मक समय में बच्चे को अच्छी से अच्छी शिक्षा देने के लिए उसे दोहरी जिममेदारी निभानी पडती है । वह घर और नौकरी अथवा व्यवसाय दोनों जिममेदारीयों को बखूबी निभाती है
धन्य है माँ ।
happy mother's day.