Wednesday, 14 March 2018

उम्मीद

  न जाने किस उम्मीद मेंं
   पथराई आँखें
   रोज टकटकी लगा
   देखा करती बंद दरवाजे को
    निरन्तर  ..
   इक आस है
    अभी भी
    दिल के किसी कोने में
     एक दिन जरूर लौटेगा
      लाल उसका
       सात समुंदर पार से ..
      याद है जब बचपन में
      खेलता था
        हवाई जहाज से
       कहता उडना है इसमें बैठकर
       तब क्या पता था
       सच में छोड़ ये बसेरा
       उड़ जाएगा ....दू.....र...।

     शुभा मेहता

       

Wednesday, 7 March 2018

सबला ...

सभी को महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं ...

नहीं है तू अबला
दिखा दे जमाने को
  थाम हाथ इक दूजे का
  चल साथ -साथ
   बना ले मुट्ठी
   पथ मेंं हों चाहे
   लाखों कंटक
    न रुक, चल बढ़
    लाँघ ले हर बाधा
    न होने दे अब
    कोई अग्नि परीक्षा
   न बने कोई अब, उपेक्षित उर्मिला
     चल निकल पड़
      पाने को मंजिल
     छू ले आसमाँ ....।
 
शुभा मेहता ..
8 th March ,2018
  

Wednesday, 28 February 2018

उदास बचपन

  उदास मन ,उदास तन
   चारों ओर उदासी
    न है कोई आसपास अपना
    न समय किसी के पास
    कोई तो पूछे
     मेरे दिल का हाल
     माँ -पापा... बस काम ही काम
     हाँ लाकर जरूर दिए हैंं
    ढेरों खिलौने
     पर खेलूँ किसके साथ
    कितने सारे गेजेट्स ..
    उन्हें क्या मालूम
     कितना हूँ अकेला
    बस चाहत है
    कुछ पल तो रहें
    वो मेरे साथ
     क्या करूँ..?
    कोई दवा है
    जो दे दे खुशी
     या उदासी को ही गले लगाऊँ
     या फिर खो जाऊँ सपनों मेंं
     या फिर नाचूँ ,गाऊँ
     अकेले मेंं चुपके से कह लूँ
      नहीं है प्यार मुझसे किसी को
   या फिर इस उदासी को
     घोल के पी जाऊँ शरबत में ....।

  शुभा मेहता..

Thursday, 15 February 2018

खलल....

जी हाँ ,पडती है खलल
जीवन में मेरे जब
  आकर कोई कर जाता
  है सपनों को ध्वस्त मेरे
   देता है झकझोर मेरे
    समूचे अस्तित्व को,
  कितनी आसानी से
  कह जाता है ,
  ये करो ,वो मत करो
   शायद उनकी
  नजरों में
   मेरा न कोई अस्तित्व है
  न व्यक्तित्व
    जब भी बुनना चाहूँ
      सपने ,ठानू उन्हें
     पूरा करनें की
   फिर कोई हाथ
   आकर झकझोर जाता है..
    डाल जाता है
      खलल ....अनचाही ...।

शुभा मेहता ..

 

Tuesday, 6 February 2018

नदी ....

मैं हूँ नदी .....
निकल कर पहाड़ों की गोद से ,
  आ पहुँचती धरा पर
    सबका जीवन
   निर्मल करने
      रवि किरणें जब
      मुझको छूती
     मैं चमक उठती रजत सी
      इठलाती ,बलखाती
    चंचल, चपल
    जीवन देनारी ।
    पर  हे मानव ....
   तू क्यों है
   इतना स्वार्थ मगन
    करता क्यों नहीं मेरा जतन
    उँडेल कर जमाने का करकट
    करता है क्यों मुझको मैला
    कहती हूँ तुझसे
    अब भी संभल जा
     नहीं तो तुझको
    कष्ट पडे़गा सहना
      कहीं ये तेरी करनी
     पड़ जाए तुझे न
    मँहगी ....
    संभल जा अभी भी ...
    ओ मानव संभल जा ....।
    
   शुभा मेहता
   7th Feb .2018

    

Saturday, 27 January 2018

किसान .....

रंग बिरंगे फूल खिले हैं
खेतों और खलिहानों में
आमों पर भी बौर आ गए
  कोयल कूके डालों पर
चारों ओर छाई हरियाली
कोमल कोमल प्यारी प्यारी
दूब लगे कालीन समान
  गेहूँ की बालें लहराएं
   मस्त हवा के झोंके से
    वाह..........
   कितना सुंदर दृश्य मनोरम
    धरती लगती कितनी सुंंदर
   पर वो किसान ..
   जो है हम सबका पालनहार
  करता खून पसीना एक
   खेतों को लहराने मेंं
   अन्न धान उगाने मेंं
  क्यों है उदास ?
क्यों है विवश
कर्ज में डूबा
  अपनें  ही लगाए
  पेडों पर
    लटक जानें को
   आत्मदाह कर जाने को
   छोड़ जाने को
   रोते बिलखते
   बच्चों को ...

  शुभा मेहता
  27 th January ,2018
  
   
  
   
  
 

Thursday, 18 January 2018

बवाल

यहाँ तो हर जगह
मचा है बवाल
  कभी धर्म के नाम पर
कभी संप्रदाय के
  हिंसा ,तोड़फोड़
  धरने , हडतालें
   बस ,बवाल ही बवाल है
   चारो ओर
   जलती हुई बसें
  सिसकते हुए
निर्दोष , मासूम
  आम लोग
   जिन्हें शायद
  इन सब बातों से
  कोई सरोकार नहीं
   फिर भी ,
   खो जाती है
    किसी की माँ
किसी का भाई
  इन बवालियों के
  फसादों में
   आखिर कब तक ?
    कब मिटेगी ये
     दीवारें ...
    कब होगा
लहू का रंग एक ....
  
  
  शुभा मेहता
   18th January ,2018