न जाने किस उम्मीद मेंं
पथराई आँखें
रोज टकटकी लगा
देखा करती बंद दरवाजे को
निरन्तर ..
इक आस है
अभी भी
दिल के किसी कोने में
एक दिन जरूर लौटेगा
लाल उसका
सात समुंदर पार से ..
याद है जब बचपन में
खेलता था
हवाई जहाज से
कहता उडना है इसमें बैठकर
तब क्या पता था
सच में छोड़ ये बसेरा
उड़ जाएगा ....दू.....र...।
शुभा मेहता