Tuesday, 25 June 2019

बारिश

बारिश की इक बूँद हूँ मैं
छोटी -सी ,नन्ही -सी
एक से एक जब मिल जाएँ
   घट भर जाए ......
    प्यास बुझाए ....
     मुझ बिन सूना
      सब संसार
      जतन करो ..
      जतन से ...।

     शुभा मेहता
     25 th June 2019

Tuesday, 11 June 2019

इंसानियत

इंसान ही मर चुका जब
कहाँ से आएगी इंसानियत ?
  हैवान बन गया वो
  हैवानियत ही हैवानियत ..
   गुड्डे -गुडि़या खेल -खिलौने
    खेलने थे जब ...
     नोंच -नोंच कर खा गए
      इंसान के खोल में
      गिद्ध ,चील ,कौवे
      कहाँ का इंसान
      और कहाँ की इंसानियत ।
     
    शुभा मेहता 12th,July 2019
  

Monday, 27 May 2019

रानी (लघुकथा )


छोटी सी ,प्यारी सी गुडिया सी थी वो ,नाम था उसका रानी । माँ ,पापा ,दादा ,दादी सबकी दुलारी । हमेशा मुस्कुराती रहती और बहुत मीठा बोलती थी ।
बहुत बडा सा घर था उनका ,न जाने कितने छोटे -बडे़ कमरे थे । घर के नीचे लाइन से आठ ;दस दुकानें थी ,जो सभी किराए पर दी हुई थी ।
  रानी रोज उन दुकानों का चक्कर लगाती ,और जब दुकानदार आदर से उसे  हाथ जोड नमस्ते करते ,तब वो अपने आप को किसी राजकुमारी  से कम न समझती ।
उन सभी दुकानों में एक दुकान किराने की भी थी ,रानी को वहाँ बैठना सबसे अच्छा लगता था । वहाँ बैठकर वह लोगों को चीजें खरीदने देखती थी ।
रानी देखती ,कि कुछ लोग रोज बहुत थोडी थोडी चीजें खरीदते थे एक या दो रुपये में शक्कर ,चाय ,दाल थोडा सा तेल । वो दुकान वाले चाचाजी से पूछती ,ये लोग रोज इत्ती -इत्ती सी चीजें क्यों लेते हैं एक साथ क्यों नहीं लेते ..तब दुकान वाले चाचाजी उससे कहते ..बेटा ये रोज़ कमाकर रोज़ खाने वाले लोग है बहुत गरीब हैं ।
रानी को तब समझ नहीं आता ये गरीब क्या होता है ?
  समय गुज़रा और देखते-देखते रानी सयानी हो गई ,पढाई पूरी होते -होते उसका विवाह भी अच्छे घर  में निश्चित हो गया ,और रानी ब्याह कर ससुराल चली गई । कुछ समय तक सब कुछ ठीक चलता रहा फिर अचानक एक दिन जोरों की बाढ़ आई और बहा ले गई उसके घरोंदे को , इतने जतन से बसाया घर मिनटों में तहस -नहस । पूरे घर का सामान बाढ़ की भेंट चढ़ गया । रानी नें हिम्मत न हारी ,अपने पति और परिवार वालों के साथ फिर से लगन व मेहनत से घरौंदा बनाया । आराम से गृहस्थी चलनें लगी । इस बीच रानी दो प्यारे -प्यारे बच्चों की माँ बन गई । समय पंख लगाकर उडने लगा ।
  अचानक फिर से जोरों का तूफान आया ,रानी का जीवन फिर से हिचकोले खाने लगा । और इस बार तूफान नें सब कुछ तहस -नहस कर दिया ।
कुछ समझ नहीं आ रहा था करें तो क्या करें ।
बच्चे भी अब बडे़ हो चले थे । उनकी शिक्षा में कोई कमी नहीं आनी चाहिए ,यह सोच रानी अपने पति के साथ फिर से हिम्मत के साथ जूझ पडी ,अपने  घरौंदे को फिर से बनाने में । उसे भरोसा था ,कल जरूर अच्छा होगा ।
  अब उसे समझ आ गया था कि गरीबी क्या होती है ...,जब वो सौ रुपये में शक्कर ,दाल थोडा सा तेल लाती ,आँख से दो अश्रु बिंदु आनायास ही निकल पड़ते ।
शुभा मेहता

26th June ,2019
 

Wednesday, 22 May 2019

आओ ,,मिलकर वृक्ष लगाएं...

चलो .....,कुछ अच्छा करते हैं
सब मिलकर ,कुछ अच्छा करते हैं
ले आओ कुछ बीज
वृक्षारोपण करते हैं
चलो ..कुछ अच्छा करते हैं
वट ,पीपल ,नीम ,गुलमोहर
आम,अनार और अमरूद
कहीं बिछा दे ,दूब हरी सी
  जो लगे हरे गलीचे सी
   धरती माँ को खूब सजा कर
   दुल्हन सा बनाएं .
  चलो ,कुछ अच्छा करते हैं ।
  

   शुभा मेहता
   25th May ,2019
  

 
   

  
 
   

 

Wednesday, 8 May 2019

गुलमोहर

सडक के  उस पार
गली के छोर पर
हुआ करते थे
  दो गुलमोहर ...
  बडे़ मनोहर लगते थे मुझे
   जब लद जाया करते थे
   फूलों से .....
    एक केसरी
    और दूसरा पीला
     मेरे मन को बहुत भाते थे
      खिडकी से बस दूर से निहारा करती
       वृक्षों के नीचे खिरे हुए फूलों की
       चादर सी बिछ जाती थी जब
        मानो हो मखमली कालीन
        मन करता था जाकर
         पग फैलाकर
          कर लूँ क्षण आराम ..।
           पर अब वो नहीं हैं
          काट डाला
           कुछ इंसानों ने मिलकर
           नहीं दिखता वो
          मखमली कालीन
          क्योंकि वहाँ तो
          तिमंजिला मकान बन गया है ...।
         

     शुभा मेहता
      9th May ,2019
          
            
          
     
   

Wednesday, 1 May 2019

टिफिन

ऑफिस में मित्रों के साथ
  लंच टाइम में
  जब भी टिफिन
खोलकर बैठती
  सबकी नज़रें
   मेरे खाने की
    ओर ही होती
      रोटी,सब्जी
       दाल ,चावल
       अचार ,पापड
        दही ,मिठाई
         कितना कुछ ..
      साथी कहते , लगता है
     माँ बनाती है तुम्हारा टिफिन
       तभी इतना स्वाद
        होता है खाने में
          माँ से जब भी मैं कहती
          माँ इतना कुछ
       क्यों रखती हो
       इतना तो समय भी नहीं होता
      इतना खा भी नहीं पाती
     माँ हँस कर कहती
      सबको खिलाया कर
       कहती ,अरे ...
       क्यों करती हो इतना काम
      पेट के लिए ही न
       और मैं निरुत्तर हो जाती
       मित्र रोज नई चीज की
.       फरमाइश करते
       और माँ बडे प्यार से बनाती
        साथी कहते बडे नसीबों वाली हो
        सच ही तो है
        माँ तो बस माँ ही होती है .....!!
         
    माँ को सादर सर्मपित ...
  
     शुभा मेहता
     8thMay ,2019
   
  
         

Saturday, 27 April 2019

चवन्नी (लघुकथा)

माँ ,मुझे सौ रुपये चाहिये ,कलर्स लेने हैं कल ड्रॉइंग की परीक्षा है ,। जा ,मेरे पर्स में से ले ले , मैं खाना बना रही हूँ , मैंने रोटी बेलते हुए रानी से कहा ।
माँ ,तुम ये चवन्नी अपने पर्स में हमेशा क्यों रखती हो ?रानी नें पैसे निकालते हुए पूछा । 
बेटा इस चवन्नी का मेरे जीवन में  बहुत महत्व है ,बहुत बडी सीख दी है इस चवन्नी ने मुझे ..
बताओ न माँ ..भला चवन्नी से क्या सीख मिली आपको ....ठीक है बताती हूँ ,मैंनें गैस बंद करते हुए कहा ....
  बात उन दिनों की है जब मैं छठी कक्षा में पढती थी । हम एक संयुक्त परिवार में रहते थे । स्कूल के लिए हमें घर से टिफिन मिलता था जिसमें पराँठा और अचार मिलता था रोज ही । हमारे स्कूल के अंदर एक चाट के ठेले वाला भी आया करता था ,जो समोसे ,पापड़ी चाट लाता था ,चवन्नी मेंं मिलती थी एक प्लेट । बहुत सी लडकियां खाने की छुट्टी में ठेले के इर्दगिर्द खडी होकर मजे ले कर खाया करती थी ।मन तो हमारा भी बहुत करता था ,पर हमें तो बस पराठे आचार से ही संतोष करना पडता था ।
   एक दिन मेरी एक सहेली बोली ,तू क्या रोज -रोज यही खाती है ,चल आज समोसे खाने चल । मैं बोली ,मेरे पास पैसे  नही है ..उसनें कहा चल मै खिलाती हूँ तुझको ...
  मन तो होता ही था ,मैं भी चल दी उसके साथ ..
वाह क्या आनंद आया था ..पर सारा आनंद तब फुर्र हो गया जब बाद मेंं उसने कहा कि कल मेरी चवन्नी वापस करना । मैं तो जैसे आसमान से गिरी । घर पर जाकर कैसे कहूँगी ...। कोस रही थी अपने चटोरेपन को ।
  खैर दो -तीन दिन तो उससे झूठ बोलती रही कि भूल गई ,पर कितने दिन । तीसरे दिन तो उसने धमकी दे डाली ,कि कल नहीं लाई तो वो मैडम से कह देगी
  अब तो कोई चारा नहीं था ,डरते-डरते माँ को बताया , 
पहले तो पडी डाँट,फिर माँ ने पैसे देते हुए समझाया कि आगे से ऐसा मत करना ।
मैंने खुशी -खुशी चवन्नी अपने बस्ते मेंं संभाल कर रखी ,और सोचने लगी कि कल जाते ही चवन्नी दे दूंगी ।
ठीक ही तो है माँ , इसमें आपने सबक क्या सीखा ।
सीधे सीधे किस्सा खत्म । रानी ने मुझे बीच में ही टोका ।
नहीं बेटा,असल बात तो अब शुरु होती है ।
तो फिर क्या हुआ ?रानी अपनी उत्सुकता रोक नहीं पा रही थी ।
होना क्या था बेटा ,मैंने भी मन ही मन उसे चिढाने का सोचा । स्कूल जाते ही बोली ..अरे आज भी मैं तेरे पैसे भूल गई ..वो बोली चल मैडम के पास ..मैं फिर उसे चिढाते हुए बोली , नहीं आती बोल ...।
  हमारी ये बहस चल ही रही थी ,तभी हमारी मैडम ने क्लास में प्रवेश किया ।
  हाजिरी के बाद आखिर उसनें मैडम से कह ही दिया कि ये मेरी चवन्नी वापस नहीं कर रही । मैं ने झट से कहा नहीं मैडम मैं दे रही हूँ । और अपना बस्ता खोलकर चवन्नी निकालने लगी ,पर चवन्नी मिली नहीं ,मैंने सारा बस्ता ढूँढ मारा ,अब तो मैं रुआंसी हो गई ,मैडम से कहा मैं लाई थी पर जाने कहाँ गई ।
मेरी बात मानने को कोई तैयार नहीं था ,क्योंकि थोड़ी देर पहले मैंनें ही कहा था कि ,मैं नहीं लाई ।
तभी मेरे पीछे बैठी मेरी सहपाठिनी को नीचे चवन्नी पडी दिखाई दी ,वो चिल्लाई ..वो रही......।
और मैंनें सबके सामने उसे चवन्नी लौटाई ।
शायद बस्ता खोलते वक्त गिर गई होगी ।
चवन्नी से मैं ने यही सबक सीखा कि ...कभी किसी से उधार नहीं लेना ,वो भी स्वाद के लिए ?कभी नही ।
पैसों के मामले में कभी मजाक मत करना। लेने के देने पड सकते है ।
बात तो आपकी सही है माँ ,रानी मुस्कुराती हुई कलर्स लेने चली गई ।

शुभा मेहता
1st May ,2019