Saturday, 19 October 2019
दीवाली
Tuesday, 24 September 2019
सुर की महिमा ...
सुर से जीवन
जीवन से सुर
नाद ब्रह्म ओंकार सुर
सुर की महिमा क्या गाऊँ मैं
पाऊँ सारी सृष्टि मेंं सुर
नदियों की कलकल मेंं सुर
पंछी की चीं-चीं मेंं सुर
भौंरे की गुंजन मेंं सुर
बर्षा की बूंदों मेंं सुर
मंदिर के घंटों मेंं सुर
बालक के हँसने मेंं सुर ..।
जब लगता है गीत शब्द मेंं
सम् उपसर्ग.....
बन जाता संगीत
सात सुरों का संगम है ये
शुद्ध -विकृत मिल बनते बारह
श्रुतियाँ हैं बाईस.....
स्वर और श्रुति मेंं भेद है इतना
जितना सर्प और कुंडली मेंं
जब फैले है सुरों का जादू
मन आनंदित हो जाता
सुर की महिमा क्या गाऊँ मैं
परम लोक ले जाए सुर ।
शुभा मेहता
25thSept. 2019
Friday, 13 September 2019
मेरी हिंदी .....
हिंदी मेरी आन है
हिंदी मेरी शान है
हे मातृभाषा मेरी
तुझको मेरा प्रणाम है
कितनी मीठी ,
कितनी सहज
शब्दों का भंडार है
अलंकारों से शोभित होती
जैसे तिय ललार बेंदी
गर्व से कहती हूँ
हिंदी लिखती हूँ
हिंदी बोलती हूँ ..
नमन है तुझको 🙏।
बस यूँ ही .....मन की बात ...
( 1)
पागल प्रेम
याद का मोती बनाए
आँख के तले ।
(2)
. झूठा कागा
पिया नहीं आए
बरसी अँखियाँ ।
( 3)
धूप ,छाँव
कोयल का राग
मेघा आए ।
(4)
चाँदनी बैठी
वृक्ष के नीचे
मुख देखे चंदा का ।
(5)
टप-टप ,टिप -टिप
बूँदों का राग
मन को भाए ।
शुभा मेहता .
Tuesday, 10 September 2019
खा़मोश बचपन
खा़मोश -सा बैठा
रहता हरदम
कहाँ गए रे
बचपन तेरे
वो खेल-कूद
वो उछल-कूद
शाला मेंं शिक्षक
घर मेंं माता-पिता ..
सबकी हैं ख्वाहिशें
किस-किस की ख्वाहिशें
पूरी करे ये बचपन
भारी बस्तों के
बोझ तले दबा
कंधों और पीठ दर्द की
फरियाद करता बचपन
घर से शाला ,
शाला से घर
गृहकार्य के बोझ से
लदा बचपन
ऊपर से ये क्लास
वो क्लास ..
आखिर क्या-क्या
करे ये बचपन
कोई ना पूछे
चाहे क्या , तू बचपन
अभी से दिमागी परेशानी से
घिरने लगा तू
कैसा हो गया है रे तू
बचपन ....... ।
शुभा मेहता
10th Sept .2019
Wednesday, 14 August 2019
तस्वीर
पता है न ....
एक दिन तुम भी
टँग जाओगे
तस्वीर में
घर के किसी
कोने में
किसी खूँटी पर ..
इसीलिए .....
प्रेम बीज बोओ
उन्हें प्रेम से पालो
सींचो प्रेम से
प्रेम फल पाओगे
क्या धरा है
झगड़े -लड़ाई में
प्रेम बोओगे
.सबके दिलों मेंं
रह जाओगे ।
शुभा मेहता
Tuesday, 6 August 2019
प्रकृति
छत पर ठंडे बिछौने पर लेट
खुला आसमान निहारना
कितना सुखद !
चलते हुए बादल ..
कभी लगते गाय से
कभी खरगोश से
अलग -अलग आकृतियां
बनती -बिगडती
घंटों ताका करती
और वो चाँद ..
कितना सुंदर
माँ कहती देखो ..
चाँद में बैठकर
बुढिया चरखा कात रही
उस बुढिया को ढूँढती
अलग-अलग कोंण से
ढूँढते -ढूँढते कब आँख लग जाती
पता ही नहीं चलता ..
छत पर ठंडे बिछौने पर .......।
शुभा मेहता
29th August ,2019