लो फिर हुआ आगमन निशा का
ओढ़ चुनरिया तारों की
चन्दा इसकी बिंदिया है
लगती कितनी प्यारी
सुलाती सबको गोद में अपनी
और दिखाती मीठे सपने
देती अलसाये लोगों को विश्राम ।
इसकी गोद में ताज़ा होकर
उठ कर जब सब सुबह -सवेरे
चल पड़ते हैँ लक्ष्य को पाने
करने सपनों को साकार ।
Thursday, 4 June 2015
निशा
Saturday, 9 May 2015
जीवन संध्या
अरे ,मैं हूँ एक चटका हुआ कप
पड़ा हूँ एक कोने मैं
रखा जाता है मुझमे कभी
बचा हुआ आटा या तेल
मुझे याद है अभी भी वो दिन
जब आया था इस घर में
मेरी मालकिन रोज चमकाती मुझे
शान से मेरी खूबसूरती बयां करती
और मैं ,गर्व से फूला न समाता ।
आज आलम है कुछ और
मेरे बाकी के साथी मुझे चिढ़ाते हैं
और आज तो हद हो गई
किसी ने कहा -अरे ये टूटा कप
क्यों रखा है इसे
बड़ा अपशगुन होता है
और फिर,फ़ेंक दिया गया मुझे
कचरापेटी में
तब से पड़ा हुआ हूँ इस गंदे ढेर पर
बस देखा करता हूँ
आते जाते लोगों को
ना जाने कब कोई आएगा
मुझे चूर-चूर कर जायेगा
शायद यही मेरी नियति है ।
Friday, 1 May 2015
माँ
ममता की छाँव
जीवन की नाव
स्नेह की मूरत
प्यारी सी सूरत
सिखाती है बुनना सपनों को वो
लगने ना देती कभी उनमें गांठ
उससे ही सीखा है मैंने
जीवन का पाठ ।
माँ है वो मेरी
माँ..... शब्द ही ऐसा है
सुनते ही जैसे
कानों में मिसरी सी घुल जाती है
एक अनोखी सी रचना है सृष्टि की
बहता है दिल में जिसके
प्रेम का अथाह सागर
लगाती हूँ जिसमे डुबकियाँ
गर हो कभी कोई गलती
देती है मीठी सी झिड़की
छुपा लेती पल्लू में
आती जब कोई मुझ पर आंच ।
शुभा मेहता
8th May 2021
Saturday, 4 April 2015
समन्वय
केलेंडर बदल गया
खूंटी वही है
रातें गुजरती हैं
तारीखें बदलती हैं
कभी सोचा है
कि हम कहाँ हैं
खूंटी की तरह वहीँ
या फिर तारीखों की तरह
आगे बढ़ रहे हैं ।
या फिर पकड़े हैं
अपनी लकीर की फकीरी ।
समय के साथ चलना सीखो
आगे बढ़ के जीना सीखो
करो समन्वय नई पीढ़ी के साथ
चलों मिला कर हाथों से हाथ
तभी तो होगी जीत तुम्हारी
पाओगे ना कभी तुम हार
पथ के कंटक फूल बनेगें
राह बने सदा गुलजार ।
Thursday, 2 April 2015
मन की बात
लगता है जैसे
अभी कल ही की बात हो
माँ का ऊँगली पकड़ चलना सिखाना
बड़े प्यारसे खाना खिलाना
हाथ पकड़ शाला ले जाना
पढ़ाना, लिखाना
बिन पूछे ही जान जाती वो
मेरे मन की सारी बात
माँ..,.जो ठहरी ।
आज जब लगा खाना कुछ बेस्वाद
बोला माँ से -आज कैसा खाना बनाया है
वो धीरे से बोली बेटा अब उम्र हो गई है ना
शायद नज़र कमजोर हो गई है
मैं अवाक् सा देख रहा था उसे
कभी कहा नहीं उसने
पर क्यों न समझ पाया मैं
उसके मन की बात ?
और आज माँ है बहुत बीमार
बैठा हूँ सामने उसके
देख रहे दोनों एकटक
एकदूजे को
आज समझ रहा हूँ
उसके मन की बात
वो सोचे है -अब तो उठा ले ईश्वर
मत बना बोझ
और मैं रहा था सोच -हे ईश्वर
अगले जन्म में
बनाना इन्हें बेटी मेरी
शायद ममता का
थोडा कर्ज तो उतार सकूँ
Wednesday, 18 March 2015
रिश्ते
बड़े अजीब होते है ये रिश्ते
कुछ बने बनाये मिलते हैं
तो ,कुछ बन जाते हैं
और कुछ बनाये जाते हैं
स्वार्थपूर्ति के लिए
कैसे भी हों ,आखिर रिश्ते तो रिश्ते हैं
बड़े नाजुक से
संभालना पड़ता है इन्हें
बड़े जतन से
लगाना पड़ता है
"हैंडल विथ केअर 'का लेबल
वर्ना टूट कर बिखरने का डर
ग़र टूटे तो जुड़ नहीं पाते
और चटक गए तो.......
ताउम्र सहनी पड़ती है कसक
कोई मरहम ,कोई दवा काम नहीं आती
शायद समय के साथ गहराई कम हो जाती है छोड़ जाती है कुछ निशाँ....
जिन्हें देखकर एक टीस सी उठती है बड़े अजीब होते हैं ये .............रिश्ते....।
शुभा मेहता
Saturday, 28 February 2015
चित्रकार
अरे ओ चित्रकार
कौन है तू ,कभी देखा नहीं
रहता है कहाँ तू ?
कैसे भरता है रंग इस जगत में
कहाँ से लाता है इतने ?
ये हरे भरे पर्वत ,ये नदियाँ ,ये झरनें
ये पेड़ पौधे फलों से लदे
हैं जो लाल,पीले ,नीले रंगों से सजे ।
क्या तू है वही जिसे ,हमनें है बैठाया
मंदिर ,मस्जिद ,चर्च और गुरुद्वारे में
तूने तो बांटे हैं सभी को
रंग एक जैसे
फिर क्यों कोई करता है
तेरे बनाये इस
सतरंगी जहाँ को मटमैला
भर के रंग हिंसा का
नफरत का
द्वेष का
अरे तू आता क्यों नहीं
बचाने अपनी सुंदर
सतरंगी दुनियाँ को ।