ये तो ववत -वक़्त की बात है
कभी मिलता है तो कभी मिलाता है
कभी खामोश सा बैठाता है
कभी कहकहे लगवाता है
तो कभी अनायास रुलाता है
कभी उलझे रिश्तों को सुलझाता है
तो कभी खुद ही को खुद से लड़ाता है
और ,गुजरते -गुजरते
दे जाता है ज़बीं पे लकीरें कुछ
साथ में बहुत कुछ सिखा भी जाता है
अच्छा ,बुरा बस गुज़र ही जाता है ।
Tuesday, 20 October 2015
वक़्त
Friday, 2 October 2015
जीवन
जीवन , निरंतर गतिशील
जैसे बहता झरना
वक़्त गुजरता है
पंख लगाकर
रुकता नहीँ किसी के रोके
ये गुजरता वक़्त
देता नहीँ दिखाई
पर , दिखा बहुत कुछ देता है
कुछ चाहा सा,कुछ अनचाहा
करा बहुत कुछ देता है
वो बचपन के प्यारे दिन
खेल कूद गुजारे थे जो
न जाने कब अतीत बन जाते हैं
बस रह जाती है यादें
कुछ खट्टी सी कुछ मीठी सी ।
कुछ धुंधली सी ,कुछ उजली सी ।
जिन्हें याद कर के कभी मुस्कुराते है
कभी गुनगुनाते है
और ये यादें कभी डबडबा देती है आँखों को
यही तो जीवन है
बहता झरना....
Thursday, 10 September 2015
संस्मरण - मेरी सहेली
बहुत साल पुरानी बात है तब मैं कोई 9 -10 साल की रही होंगी ।मेरी एक सहेली थी जो हमारे घर के पीछे ही रहती थी । शाला से आकर अपना काम निपटा कर मैंअक्सर उसके पास चली जाती थी ।उसका बात करने का जो तरीका था वो मुझे बहुत अच्छा लगता था वो बोलती थी और मैं बस सुनती रहती । किसी भी छोटी सी बात का वर्णन वो ऐसे करती जैसे कितना बड़ा काम किया हो ।
जब हम छोटे होते है तो हमे घर में कोई भी छोटे -मोटे काम करने को दिए जाते है ताकि हम आगे जाकर जिम्मेदार बन सकें ।जैसे मुझे चाय बनाने का काम मिला हुआ था वैसे ही सीता यानि मेरी सहेली को भगवान् की दिया बत्ती का काम उसकी माँ ने दे रखा था ।
एक दिन जब शाम को मैं उसके पास पहुँची तो वो बोली आज तो बड़ी थक गई हूँ ।मैंनेपूछा क्या हुआ ? तो वो बोली अरे क्या बताऊँ स्कूल से आई तो देखा भगवान का दीपक अभी तक किसी ने साफ़ नहीं किया था ।जल्दी -जल्दी साफ़ किया ,रूई निकाली ,बत्ती बनाई अब देखा तो घी जमा हुआ था ,रसोई में जाकर देखा तो चूल्हा भी बुझ चुका था (उन दिनों चूल्हे या अंगीठी पर ही खाना बनाया जाता था ,गैस स्टोव का प्रचलन कम ही था ) अब क्या करती धूप भी नही थी कि उसमे ही घी पिघलाती । पड़ोस में गई वहाँ घी पिघलाया ,दिए में बत्ती डाली ,माचिस में से तीली निकाली ,जलाई तब कही जाकर दिया बत्ती हुई बाप रे कितना थक गई ।
मैं भी उसकी बातों का मज़ा ले रही थी।
बड़ी प्यारी थी वो ।
Monday, 7 September 2015
संज्ञा
जी हाँ ,संज्ञा हूँ मैं
व्यक्ति या वस्तु ?
कभी -कभी ये बात सोच में डाल देती है
रूप है,रंग है ,आकार भी है
दिल भी,दिमाग भी
पर लगता है जैसे वस्तु ही हूँ मैं
जिसे,जहाँ चाहे रख दो
मन हो उठा लो
या शो केस में सजा लो
एक धड़कता दिल तो है सीने में
धड़कन किसी को सुनाई न देती
इच्छाएँ ,आशाएँ ,उम्मीदें भी हैं
जो किसी को दिखाई न देती
अब तो आलम ये है कि
खुद ही भ्रमित हूँ
क्या हूँ मैं
निर्जीव या सजीव ?
बस संज्ञा हूँ मैं ।
Wednesday, 2 September 2015
दूसरा पहलू
देखा पलट के पीछे की ओर
था नज़ारा वहाँ कुछ और
होठों पर थी मुस्कान जैसे ओढ़ी हुई
उस खिलखिलाहट के पीछे
छुपा दर्द भी देखा था मैंने
हक़ीकत यही थी
न हँसना न रोना
न प्यार ,न उसका एहसास
कहने को तो सभी थे अपने
फिर भी पाया अकेला स्वयं को
सब कुछ था फिर भी
दिल का एक कोना था उदास
न थी जिसमे कोई जीने की आस
ये दिल का कोना न देख ले कोई
इसलिए सदा मुस्कुराना है
खिलखिलाना है
इसे सजाना है ।
Thursday, 6 August 2015
बंधन
रक्षा का बंधन
बंधन अनोखा
शहद में भीगा
मीठा मीठा
रसीले आम सा
जिसमें भरा है जीवन रस ।
कितने सुहाने थे
बचपन के वो पल
गुजारे थे जो हमने
साथ साथ
छीना झपटी ,मारा मारी
खेले कूदे साथ साथ
भाई सदा ही आगे चलता
और बहन की रक्षा करता
जब आये उस पर कोई विपदा
हाथ सदा माथे पर रखता ।
भाई -बहिन का स्नेह निराला
कितना सच्चा ,कितना प्यारा
Monday, 27 July 2015
पिछले दिनों
पिछले दिनों मैंने देखी फ़िल्म बजरंगी भाई जान ।
जिसे निर्देशित किया कबीर खान ने ।
फ़िल्म के मुख्य कलाकार हैं सलमान खान ,करीना कपूर खान ,नन्ही बाल कलाकार हर्षाली नवाजुद्दीन सिद्दीकी और मेहमान कलाकार के रूप में हैं ओम पुरी ।
फ़िल्म की शुरुआत होती है बर्फीली पहाड़ियों और चिनार के पेड़ों के दृश्य से । और साथ ही भारत पाकिस्तान का क्रिकेट मैच ।
यह एक हनुमान भक्त पवन की कहानी है जो एक पाकिस्तानी बच्ची को उसके परिवार से मिलाने केलिए जान पर खेल जाता है। सलमान को इस प्रकार के रोल में देख के अच्छा लगा ।उन्होंने इस फ़िल्म में अपनी अभिनय प्रतिभा। का परिचय दिया है । बाल कलाकार हर्षाली ने तो सबका मन मोह लिया । हालाँकि उसका कोई संवाद नहीं था केवल आँखों से उसने अपनी अभिनय प्रतिभा का परिचय दिया है । नवाजुद्दीन लाजवाब रहे। करीना बहुत खूबसूरत लगी है। फ़िल्म अंत तक दर्शकों को बाँधे रखती है ।
संगीत प्रीतम जी का है । तू जो मिला गीत अच्छा बन पड़ा है ।
फ़िल्म के कहानीकार के अनुसार ये अमन की आशा की और एक कदम है । दोनों देशों के संबंधों को सुधरने का प्रयास है। फ़िल्म दोनों देशों में साथ रिलीज़ हुई और सराही गई ।
अब सवाल ये है के क्या वाकई में ऎसे प्रयत्नों से अमन की आशा पूरी होगी ।