Monday, 30 November 2015

ठूँठ

     हाँ ..... ठूँठ हूँ मैं
      आते-जाते सभी लोग
      लगता है जैसे चिढ़ाते हुए निकल जाते मुझे
        भेजते लानत मुझ पर
     कहते - कैसा ठूँठ सा खड़ा है यहाँ
     इसके रहते इस जगह का सौंदर्य
     जैसे ख़त्म सा हो गया है
     और मैं उनकी बातों पर चिड़चिड़ा उठता
        मन ही मन ,पर पूछ नहीं पाता
        कि मुझे ठूँठ बनाया किसने 
      आँसू भी सूख चुके थे अब तक
       ठूँठ जो हूँ.....
          याद है मुझे अभी भी
      जब मैं बीज था
     कुछ बच्चे मुट्ठी में लेकर
      लाये थे मुझे उगाने
     रोज करते थे मेरा जतन
     धीरे -धीरे अंकुर फूटे
       बच्चे कितने खुश थे
      नाच रहे थे ताली बजा -बजा कर
        फिर धीरे -धीरे बन गया मैं एक विशाल वृक्ष
      छाया में मेरी खेला करते बच्चे दिनभर
     कितने ही पक्षियों का बसेरा था
    मेरी शाखाओं में
      कितना खुश था मैं
     फिर अचनक एक दिन ..
   ठाक... एक जोर का प्रहार
    अपनी पीड़ा छुपा के देखने लगा इधय -उधर
     मैंने सुना लोग कह रहे थे
     अरे ये पेड़ तो है अब बेकार
     चलो काट डालो इसे
  मैं अवाक् सा रह गया
    मैँने तो खुशियाँ ही बांटी
     अपना सब कुछ तो दे दिया
    फिर सोचा अरे ये तो इंसान है
अपनों को ही नहीं छोड़ता
   फिर मैं तो पेड़ हूँ
    मेरी क्या बिसात ।
   
     

Sunday, 8 November 2015

पिंजरे की मैना

  पिंजरे की मैना ये ,
  किसे सुनाये दास्ताँ दिल की
   कितनी खुश थी जंगल में वो
    दिन भर चहकती रहती थी
    इस डाल से उस डाल पर
    इस टहनी से उस टहनी
    जहाँ चाहे उड़ जाती थी
   कच्चे -पक्के कैसे भी फल
    तोड़ तोड़ खा लेती थी
     कितना अच्छा जीवन था वो
    आज़ादी से भरा हुआ
      चलती थी मनमर्जियाँ
      थी साथ कितनी सखियाँ -सहेलियाँ
     अब इस सोने के पिंजरें में
      घुटता है दम
       नहीं चाहिए ये स्वादिष्ट व्यंजन
         बस कोई लौटा दे मुझको
        फिर से मेरी आज़ादी  ।

   
    

Tuesday, 20 October 2015

वक़्त

     ये तो ववत -वक़्त की बात है
      कभी मिलता है तो कभी मिलाता है
      कभी खामोश सा बैठाता है
       कभी कहकहे लगवाता है
      तो कभी अनायास रुलाता है
        कभी उलझे रिश्तों को सुलझाता है
        तो कभी खुद ही को खुद से लड़ाता है
        और ,गुजरते -गुजरते
       दे जाता है ज़बीं पे लकीरें कुछ
      साथ में बहुत कुछ सिखा भी जाता है
     अच्छा ,बुरा बस गुज़र ही जाता है ।
  

Friday, 2 October 2015

जीवन

    जीवन , निरंतर गतिशील
     जैसे बहता झरना
    वक़्त गुजरता है
      पंख लगाकर
         रुकता नहीँ किसी के रोके
        ये गुजरता वक़्त
         देता नहीँ  दिखाई
        पर , दिखा बहुत कुछ देता है
        कुछ चाहा सा,कुछ अनचाहा
       करा बहुत कुछ देता है
   
         वो बचपन के प्यारे दिन
           खेल कूद गुजारे थे जो
      न जाने कब अतीत बन जाते हैं
    बस रह जाती है यादें
       कुछ खट्टी सी कुछ मीठी सी ।
       कुछ धुंधली सी ,कुछ उजली सी ।
       जिन्हें याद कर के कभी मुस्कुराते है
       कभी गुनगुनाते है
       और ये यादें कभी डबडबा देती है आँखों को
       यही तो जीवन है
       बहता झरना.... 
       
  

      

            
   
       

Thursday, 10 September 2015

संस्मरण - मेरी सहेली

बहुत साल पुरानी बात है तब मैं कोई 9 -10 साल की रही होंगी ।मेरी एक सहेली थी जो हमारे घर के पीछे ही रहती थी । शाला से आकर अपना काम निपटा कर मैंअक्सर उसके पास चली जाती थी ।उसका बात करने का जो तरीका था वो मुझे बहुत अच्छा लगता था वो बोलती थी और मैं बस सुनती रहती । किसी भी छोटी सी बात का वर्णन वो ऐसे करती जैसे कितना बड़ा काम किया हो ।
     जब हम छोटे होते है तो हमे घर में कोई भी छोटे -मोटे काम करने को दिए जाते है ताकि हम आगे जाकर जिम्मेदार बन सकें ।जैसे मुझे चाय बनाने का काम मिला हुआ था वैसे ही सीता यानि मेरी सहेली को भगवान् की दिया बत्ती का काम उसकी माँ ने दे रखा था ।
      एक दिन जब शाम को मैं उसके पास पहुँची तो वो बोली आज तो बड़ी थक गई हूँ ।मैंनेपूछा क्या हुआ ? तो वो बोली अरे क्या बताऊँ  स्कूल से आई तो देखा भगवान का दीपक अभी तक किसी ने साफ़ नहीं किया था ।जल्दी -जल्दी साफ़ किया ,रूई निकाली ,बत्ती बनाई अब देखा तो घी जमा हुआ था ,रसोई में जाकर देखा तो चूल्हा भी बुझ चुका था (उन दिनों चूल्हे या अंगीठी पर ही खाना बनाया जाता था ,गैस स्टोव का प्रचलन कम ही था ) अब क्या करती धूप भी नही थी कि उसमे ही घी पिघलाती । पड़ोस में गई वहाँ घी पिघलाया ,दिए में बत्ती डाली ,माचिस में से तीली निकाली ,जलाई  तब कही जाकर दिया बत्ती हुई बाप रे कितना थक गई ।
     मैं भी उसकी  बातों का मज़ा ले रही थी।
      बड़ी प्यारी थी वो ।

   

Monday, 7 September 2015

संज्ञा

   जी हाँ ,संज्ञा हूँ मैं
     व्यक्ति या वस्तु ?
  कभी -कभी ये बात सोच में डाल देती है
   रूप है,रंग है ,आकार भी है
   दिल भी,दिमाग भी
    पर लगता है जैसे वस्तु ही हूँ मैं
    जिसे,जहाँ चाहे रख दो
   मन हो उठा लो
    या शो केस में सजा लो
     एक धड़कता दिल तो है सीने में
  धड़कन किसी को सुनाई न देती
इच्छाएँ ,आशाएँ ,उम्मीदें भी हैं
जो किसी को दिखाई न देती
  अब तो आलम ये है कि
खुद ही भ्रमित हूँ
   क्या हूँ मैं
   निर्जीव या सजीव ?
बस संज्ञा हूँ मैं ।

Wednesday, 2 September 2015

दूसरा पहलू

    देखा पलट के पीछे की ओर
      था नज़ारा वहाँ कुछ और
       होठों पर थी मुस्कान जैसे ओढ़ी हुई
       उस खिलखिलाहट के पीछे
         छुपा दर्द भी देखा था मैंने
          हक़ीकत यही थी
        न हँसना न रोना
         न प्यार ,न  उसका एहसास
          कहने को तो सभी थे अपने
          फिर भी पाया अकेला स्वयं को
          सब कुछ था फिर भी
        दिल का एक कोना था उदास
         न थी जिसमे कोई जीने की आस
          ये दिल का कोना न देख ले कोई
         इसलिए सदा मुस्कुराना है
        खिलखिलाना है
           इसे सजाना है ।