Thursday, 14 January 2016

सपने....

  सपने जो देखे थे
     एक साथ हमने
     पूरा करने की
       होड़ में , साथ
       धीरे -धीरे जैसे
       छूटता सा गया
       जिन्हें , पाने की
      चाह में जीवन जैसे
       रीत सा गया
      आज ये , कल वो
     कब होंगे पूरे ये
      अब तो जैसे
     बन गये हैं हम -तुम  
     एक नदी के दो किनारे
     साथ तो चलते हैं
    मगर कितनी दूर
     और ये ,
     कभी न ख़त्म होने वाले सपने
    या कहो -इच्छाएँ
     चलो अब बहुत हुआ ....
     साथ मिलकर डुबकी लगाएं
     आ जाये भँवर में
      पकड़ हाथ एक -दूजे का
      एक किनारे लग जाये ।
     

Friday, 8 January 2016

फुटपाथी

    सर्द ठिठुरती रात में
       एक चादर भी
     मयस्सर नहीं जिन्हें
     कुछ चिथड़े से लपेटे हुए
      देखा है कई बार इन्हें
      सर्द हवा के झोंकों से
      बचने की नाकाम कोशिश
        करते हुए....
      ना कोई ठौर ना ठिकाना
     फुटपाथ हीं इनका बसेरा है
      देखा है छोटे -छोटे बच्चों को
      टूटे-फूटे खिलौनों से
       खेलते हुए और
       सिगनल पर
      नए खिलौने बेचते हुए
      सर्द हवा से बचने के लिए
     जुगाड़ करते है
      कुछ लकड़ी के टुकड़े
      अलाव जलाने को
     नींद आती है लेकिन
     सो नहीं पाते
      इस डर से कि
     कहीं कोई तेजी से
     आती हुई कार
      कुचल न डाले उन्हें
     इसलिए जागते है रात भर
     उनके लिए तो ,उनकी ज़िन्दगी है
      अनमोल ....
     औरों के लिए हो ना हो
     जी हाँ ....ये हैं फुटपाथी ।
    
      

Tuesday, 29 December 2015

स्वागतम्

  आओ मिल करें सब
    स्वागत नववर्ष का
     मिल गले एक दूजे से
     करले दूर गिले -शिकवे
     ख्वाहिशें जो रह गई
      अधूरी हैं ..
      आओ सजा लें
       फिर से मन में
        मंजिल को पाना है
हौसला बुलंद करें
    आओ ....
ज़िन्दगी की थाली को
   प्रेम से सजाएं
    भर दें उसमे स्वाद सभी
     खट्टे , मीठे , चरपरे
    आओ मिल .....

Tuesday, 1 December 2015

ठहाके

   सब कहते हैं , मैंने भी पढ़ा है
     हँसना अच्छा है सेहत के लिए
       अब सवाल ये है कि
      हँसू तो किस बात पर
         किसके साथ या किस पर
        या अकेले ही कहकहे लगाऊँ
       लोग समझेंगे पगला गई है
      पहले जब देखती थी मैँ
      बगीचों में लोगों को
      झूठे कहकहे लगाते
      सोचती क्यों ये
      झूठे कहकहे लगाते हैं
       क्या सच में ऐसा कुछ नहीं इनके पास
       जो दिल से ठहाके लगा सके
       पर महसूस होता है आज
       झूठे ही सही , ठहाके तो हैं
     हँसना अच्छा है न सेहत के लिए
     अब तो ठान लिया है मैंने भी
       झूठे ही सही ठहाके लगाऊँगी
      अकेले-अकेले  मुस्कुराऊंगी
      माता , पिता ,बंधु , भ्राता
   सभी स्वयं बन जाऊँगी
       क्योंकि ........हँसना.......
      अच्छा है सेहत के लिए ।

Monday, 30 November 2015

ठूँठ

     हाँ ..... ठूँठ हूँ मैं
      आते-जाते सभी लोग
      लगता है जैसे चिढ़ाते हुए निकल जाते मुझे
        भेजते लानत मुझ पर
     कहते - कैसा ठूँठ सा खड़ा है यहाँ
     इसके रहते इस जगह का सौंदर्य
     जैसे ख़त्म सा हो गया है
     और मैं उनकी बातों पर चिड़चिड़ा उठता
        मन ही मन ,पर पूछ नहीं पाता
        कि मुझे ठूँठ बनाया किसने 
      आँसू भी सूख चुके थे अब तक
       ठूँठ जो हूँ.....
          याद है मुझे अभी भी
      जब मैं बीज था
     कुछ बच्चे मुट्ठी में लेकर
      लाये थे मुझे उगाने
     रोज करते थे मेरा जतन
     धीरे -धीरे अंकुर फूटे
       बच्चे कितने खुश थे
      नाच रहे थे ताली बजा -बजा कर
        फिर धीरे -धीरे बन गया मैं एक विशाल वृक्ष
      छाया में मेरी खेला करते बच्चे दिनभर
     कितने ही पक्षियों का बसेरा था
    मेरी शाखाओं में
      कितना खुश था मैं
     फिर अचनक एक दिन ..
   ठाक... एक जोर का प्रहार
    अपनी पीड़ा छुपा के देखने लगा इधय -उधर
     मैंने सुना लोग कह रहे थे
     अरे ये पेड़ तो है अब बेकार
     चलो काट डालो इसे
  मैं अवाक् सा रह गया
    मैँने तो खुशियाँ ही बांटी
     अपना सब कुछ तो दे दिया
    फिर सोचा अरे ये तो इंसान है
अपनों को ही नहीं छोड़ता
   फिर मैं तो पेड़ हूँ
    मेरी क्या बिसात ।
   
     

Sunday, 8 November 2015

पिंजरे की मैना

  पिंजरे की मैना ये ,
  किसे सुनाये दास्ताँ दिल की
   कितनी खुश थी जंगल में वो
    दिन भर चहकती रहती थी
    इस डाल से उस डाल पर
    इस टहनी से उस टहनी
    जहाँ चाहे उड़ जाती थी
   कच्चे -पक्के कैसे भी फल
    तोड़ तोड़ खा लेती थी
     कितना अच्छा जीवन था वो
    आज़ादी से भरा हुआ
      चलती थी मनमर्जियाँ
      थी साथ कितनी सखियाँ -सहेलियाँ
     अब इस सोने के पिंजरें में
      घुटता है दम
       नहीं चाहिए ये स्वादिष्ट व्यंजन
         बस कोई लौटा दे मुझको
        फिर से मेरी आज़ादी  ।

   
    

Tuesday, 20 October 2015

वक़्त

     ये तो ववत -वक़्त की बात है
      कभी मिलता है तो कभी मिलाता है
      कभी खामोश सा बैठाता है
       कभी कहकहे लगवाता है
      तो कभी अनायास रुलाता है
        कभी उलझे रिश्तों को सुलझाता है
        तो कभी खुद ही को खुद से लड़ाता है
        और ,गुजरते -गुजरते
       दे जाता है ज़बीं पे लकीरें कुछ
      साथ में बहुत कुछ सिखा भी जाता है
     अच्छा ,बुरा बस गुज़र ही जाता है ।