ब्रांडेड जूते, चप्पलों से
ठसाठस भरती जा रही
जूतों की अलमारी
बेचारे सादे
बिना ब्रांड के
पुराने चप्पल
दबे जा रहे थे
दर्द के मारे
कराह रहे थे
तभी ,इठलाती
इक ब्रांडेड जूती बोली
यहाँ रहोगे तो ऐसे
ही रहना होगा दबकर
देखो ,हमारी चमक
और एक तुम
पुराने गंदे ...हा....हा....
फिर एक दिन
पुरानी जूतों की शेल्फ
रख दी गई बाहर
रात के अँधेरे में
चुपचाप पुराने चप्पल
निकले और
धुस गए अपनी
पुरानी शेल्फ में
अपनी "औकात"
जान गए थे ।
शुभा मेहता
24th feb .2017
Friday, 24 February 2017
औकात...
Friday, 10 February 2017
आज...
जिंदगी के हर लम्हे को
मस्ती से गुजार लो
जो आज है
कल न होगा
जी भर के जी लो
आज खुशी से
तो , कल
हर पल
यादगार होगा
कल तो गया ,
कल अभी आया नही
अभी तो सिर्फ़
आज है पास हमारे
तो चलो ,
जी भर के जी लें
इन जादुई क्षणों को
आज ........
शुभा मेहता
10th feb .2017
Tuesday, 17 January 2017
अधिकार
अध्यापिका पढ़ा रही थी
मौलिक अधिकार
समानता का अधिकार ,
स्वतंत्रता का अधिकार
समझाया हर किसी को ,
है अधिकार
विचार व्यक्त करने का
तो मैंने पूछा
क्या हम भी अपने
मन के विचार व्यक्त
कर सकते हैं ?
वो बोली डाँटते हुए
चुप रहो ,कक्षा को
डिस्टर्ब मत करो
मैं बेचारी कुछ
समझ न पाई
घर जाके
पूछा माँ से
माँ ..क्या हम सभी को है
अधिकार अपने
विचार व्यक्त करने का?
है न माँ ? सच है न ?
माँ चुप ....
मैं तब भी
कुछ समझ न पाई .....
Saturday, 31 December 2016
नई नोटबुक
चलो दौड़कर ले आते हैं
नोटबुक इक नई
तीन सौ पैंसठ पन्नों वाली
कोरा सफेद
हर इक पन्ना
सोच समझ कर
भरना होगा
इक -इक पन्ना
सुंदर सुघड़
लिखाई से
प्रेम प्रीत की स्याही से ।
शुभा मेहता
31st December ,2016
Friday, 23 December 2016
समय
जीवन चलने का नाम
बहता है झरने की मानिंद
अविरत.......
समय के तो मानों
लगे हो पंख
उडता है
नही करता
किसी का इंतजार
बस समाप्ति की
ओर है ये वर्ष ,फिर....
नया साल है आने वाला
नई खुशियाँ है लाने वाला
कर ले पिछले काम खतम
फिर नईकौड़ी,नया दाव
भुला कर सब
शिकवे गिले
करनी है इक
नई शुरुआत।
शुभा मेहता
23rd Dec ,2016
Monday, 28 November 2016
प्रेम ...
प्रेम ...
खुशबू है
गुलाबों की
जैसे हर इक
पत्ती से आती आवाज
खूबसूरत गुनगुनाहट
प्रेम.....
गीत है
आत्मा का
लयबद्ध नृत्य है
सूर्य,चंन्द्रमा, तारे
सभी का प्रकाश है प्रेम.....
प्रेम .....
भक्ति है ,स्तुति है
कृष्ण है..
मीरा है ,राधा है.....प्रेम .....
शुभा मेहता
28th Nov 2016
Saturday, 26 November 2016
उड़ता पंछी
मैं , उडता पंछी
दूर....दूर .....
उन्मुक्त गगन तक
फैलाकर अपनी पाँखें
उड़ता हूँ
कभी अटकता
कभी भटकता
पाने को मंजिल
इच्छाएँ ,आकांक्षाएँ
बढती चली जातीं
और दूर तक जाने की
खाता हूँ ठोकरें भी
होता हूँ घायल भी
पंख फडफडाते हैं
कुछ टूट भी जाते हैं
और फिर , अपना सा कोई
कर देता है
मरहम -पट्टी
देता है दाना -पानी
जरा सहलाता है प्यारसे
जगाता है फिर से प्यास
और ऊपर उड़ने की
और मैं चल पड़ता हूँ
फिर से पंख पसार
अपनी मंजिल की ओर ....।
शुभा मेहता
19th Nov .2016