Wednesday, 25 July 2018

किस्मत

तू चलता चला चल
  तू चलता चला चल
   अपनी लगन में
    न देख इधर
  न देख उधर
   रख आँख तेरी लक्ष्य की ओर ।
    कोई कहे अच्छी है किस्मत
    कोई कहे बुरी है किस्मत
    बात-बात पर कोसें किस्मत
     पाना चाहे इसी के सहारे सब कुछ
     पर तू चलता चला चल ...
     और तू भी चला ,खूब चला ...
    पाने को मंजिल
     हौसले बुलंद ..।
    फिर इक दिन देखा
     सामने थी मंजिल
      पा ही लिया उसे
      और साथ ही
      मुस्कुराती किस्मत खडी थी ।

   शुभा मेहता
   26th July ,2018
     
     
 

Sunday, 8 July 2018

मेरे अनुभव ..

  आज जब शाम को वॉक के लिए गई तो देखा मंजू कुछ उदास सी दिखाई दी , मैं और मंजू रोज साथ ही वॉक पर जाते हैं ,अब दोस्ती इतनी गहरी हो गई है कि बस चेहरा देख कर ही एक -दूसरे के मनोभाव पढ़ लेते हैं । मैंने पूछा.. क्या बात है आज तुम्हारा मूड कुछ उखड़ा सा लग रहा है ,कल तो बड़ी खुश थी ,बेटे ने नई गाड़ी जो ली है ..।बस मेरा इतना कहना था कि उसकी आँखों में आँसू छलछला उठे ...।
    बोली ..हाँ ...मैं तो बहुत खुश थी ..आज सुबह बेटे नें
   कहा माँ चलो मंदिर जाना है नई कार की पूजा करनें  । मैंने खुशी खुशी पूजा की थाली तैयार की ,तभी बेटा बोला माँ जल्दी करो हमें आफिस के लिए देर हो रही है ,मैं बोली बेटा तैयार तो हो जाऊँ ,तो बेटा बोला अरे माँ  ऐसे ही बैठ जाओ ,कार में ही तो जाना है ..और मैं भी खुशी के मारे बस ऐसे ही चल दी न तैयार हुई ,न पर्स लिया । मंदिर पहुँच कर पूजा की ..भगवान की भी और कार की भी ,मन ही मन बहुत प्रसन्न थी ..बेटा ;बहू कितना ध्यान रखते है ,अपनी किस्मत पर आह्लादित हो रही  थी ।
   तभी बहू के फिस से किसी का फोन आया ,और लगभग आधे घंटे वार्तालाप चला ,और मैं स्लीपर पहने ,हाथ में थाली लिए खडी रही ,फिर अचानक बेटे नें कहा माँ हमें जल्दी फिस पहुँचना है ,आप घर चले जाओ , और वो दोनो गाडी स्टार्ट करके चले गए ..मैं आवाक् सी खडी देखती रह गई ..हाथ पैर जैसे सुन्न हो गए । पास में पैसे भी नहीं लिए थे ,हाथ में थाली पकडे धीरे धीरे घर की ओर कदम बढाने लगी .....।
       सोच रही थी क्या मेरे बेटे के पास पाँच मिनिट भी नहीं थे मेरे लिए ,घर तो छोड़ ही सकता था ..और आँसू ढुलक पडे उसके गालों पर ...

    अब सवाल ये उठता है कि क्या मंजू के बेटे ने जो किया वो सही था ...नहीं न..। पर मैं जहाँ तक जानती हूँ मंजू के बेटा बहू बहुत ही सुशील और सयाने हैं ,उनका इरादा अपनी माँ को दुखी करने का कभी हो ही नहीं सकता , असल बात तो ये है कि मंजू ने अपने बेटे को कभी कोई जिम्मेदारी सौंपी ही नही , वो सभी काम स्वयं ही कर लेना चाहती है ,और उसका बेटा अपनी माँ को सुपर वुमन समझता है ,और शायद यही वजह थी ,कि वो समझ ही नहीं पाया कि उसकी माँ घर कैसे पहुँचेगी ..क्यों दोस्तों आप क्या कहते है?

  शुभा मेहता
  
 
 
    
 
 
   

Saturday, 7 July 2018

मेघ मल्हार

  गरज आए बदरा कारे
  चहुँ ओर पावस भर लाए
    मोर -पपीहा झूमे -नाचे
      कोयल छेड़े राग मल्हार
       धरती भी तो झूम रही है
        पहन चुनरिया धानी
          पत्ती -पत्ती सजी हुई है
           बूँद मोतियों से जैसे
             बच्चे उछल -उछल कर   
              करते छप्पक-छैया
               कोई नाव बना तैराता
                कोई खुद से फिसल गिर जाता
                कहीं पकौड़ो की खुशबू .....
                 वाह.......!!
                  वर्षा के आगमन से
                   त्यौहार समाँ हो जाता ।
                
              शुभा मेहता 

         7thJuly ,2018

 
            
              
            

Wednesday, 20 June 2018

अंकुर

इक बीज के हृदयतल में
   बसता है इक छोटा अंकुर
    अलसाया सा....
    सोता हुआ.....
     उठो ,उठो ..
     रवि नें आकर चुपके से कहा
      उठो ,उठो ....
     वर्षा की बूँदों नें
      आवाज़ लगाई ....
       सुना उसने ..
       सोचने लगा ..
      इस बीज के बाहर
     कितना सुंदर जग होगा !!
     वर्षा की बूँदों से
      सूरज की किरनों से
       इक बीज अंकुरित हुआ
     जग को जिलाने ..
      छाँव दिलाने.।

   शुभा मेहता

Saturday, 16 June 2018

अंधकार

अँधेरा मन में है
   दिया जलाया मंदिर में
    मन का अँधेरा दूर कर
    जग प्रकाशित हो जाएगा ।
      नफरत की आग मन में लिए
      क्यों बैठा सत्संग में
        मन से तू ये आग बुझा
        ये जग सुंदर हो जाएगा ।

Sunday, 10 June 2018

मेघा

  मन महक उठा
  माटी की सौंधी खुशबू से
   बादलों के खुले नलों से
   जब बूँदें गिरी  अवनि पर
   भिगो गई सूखी माटी को
   कोई भी इत्र इस खुशबू को
   मात नही दे सकता ।
    मन महक उठा
     खिल उठी सारी बगिया
      पंछी गाते....
     गुनगुनाते...
    चिडिया चहकचहक कर
     पानी में नहाती
     गरमी से राहत पाती ।
  
    शुभा मेहता..
    10 June,2018
   
   

  

Friday, 8 June 2018

दहलीज़

  भोर से ही आज
   चित्त कुछ उदास था
   याद मायके की
     सता रही थी
     वो पापा का दुलार
      मम्मी का प्यार
     भैया का झगड़ा
     सभी कुछ तो
     अभी कुछ दिनों
      पहले ही तो आई थी
      छोड़ उस आँगन को
      इस दहलीज़ पर ...
      तभी खाने की टेबल पर
      कुछ हंगामा सा हो गया
       किसी ने खाना छोडा
       किसी ने उसको कोसा
        बात तो ज़रा सी थी
        सब्जी में थोड़ी खारास थी
        पर कैसे  ? न पूछा किसीने ..
        आँख की दहलीज़ से
          अश्रु की इक बूँद
         जा गिरी थी उसमें..।

   शुभा मेहता