हाँ ,ये यादें ही तो हैं
जो कुछ पल
के लिए आती हैं ज़हन में
कभी गुदगुदाती है
कभी अकेले में ही
जो़र से हँसा जाती हैं
कभी रुला भी जाती हैं
ये यादें ........
Tuesday, 29 January 2019
यादें
Wednesday, 16 January 2019
मानवता
मानव , कहाँ छुपी है तेरी मानवता
शायद दब गई है मन के किसी कोने में
तेरी इच्छाओं ,महत्वाकांक्षा के बोझ तले
आगे निकलने की होड़ में
या फिर मुझे क्या ..... ,
जैसे जुमलों के बीच
कभी सड़क पर लहुलुहान पडे
किसी मानव को देखकर भी
नही पिघलती मानवता
कभी भूख से बिलखते
बेबस ,लाचारों को देख
नहीं पिघलती मानवता .
हाँ ,कभी-कभी टहलने
निकलते देखा है इसे
कभी बस में या रेल में
जब कोई किसी को
हाथ पकड बैठाता
अपनी सीट पर
कभी कोई बच्चा
असहाय वृद्ध को
पार कराता सड़क ....।
Saturday, 5 January 2019
आशियाना
वो सुंदर सा आशियाना हमारा
आशियाना क्या ...
साकार सपनें थे हमारे
सींचा था जिसको
प्यार के नीर से
विशाल कमरे
खुला आँगन
आँगन के बीच
एक आम का पेड़
गूँजती थी जिसमें
कोयल की कूक
बच्चों की किलकारियां
मोहल्ले के बच्चे
इसी आँगन में
खेलते ,दौडते
कच्चे आम तोड कर
खाते , फैलाते
वाह!!क्या दिन थे !!
और आज ,वही आशियाना
लगने लगा पुराना
बडे जो हो गए हैं बच्चे
बोलते हैं ,बेच डालो इसे
अब यहाँ कौन है रहने वाला
कैसे समझाएं इन्हें
हमारा तो यही है आशियाना
न छोडेगें इसको
आखिरी साँस तक ...।
Monday, 31 December 2018
स्वागत ..💐💐💐💐💐💐..नववर्ष
ठकठक......ठकठक.....
अरे ,कौन दरवाजा खटखटा रहा है ?
खोला तो पाया द्वार पर नववर्ष मुस्कुरा रहा है
मैंने कहा अभी कुछ घंटे शेष हैं
तुम कुछ जल्दी नहीं आ गए ?
अभी तो कई काम करने हैं बाकी
वादे जो किये थे स्वयं से निभाने हैं बाकी
ये करूंगी ,वो करूंगी ....
पर किया न कुछ
दिन पर दिन बीते
आज नहीं कल में
हो गया वर्ष खत्म
अब पछताए होत क्या ......
फिर से दरवाज़े पर ठकठक
अरे भाई ,खोलो
मुझे आने दो
नई खुशी ,नई उमंग लाने दो
बीती ताहि बिसारि के
आगे आगे सोच
करना कुछ अच्छे काम
हों चाहे छोटे -छोटे
मेहनत करना आगे बढना
पेड़ लगाना
पैदल चलना
प्यारी सी मुस्कान से
सबका स्वागत करना .
सभी मित्रों को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं ।
शुभा मेहता
31st December ,2018
Wednesday, 28 November 2018
आवाज़
लगा जैसे नींद में
कोई आवाज़ दे रहा है
आओ ,आओ .....
अपना अमूल्य मत
हमें बेचो ,हमें बेचो
मुँहमाँगे दाम मिलेगें
अच्छा .........!!
हमनें कहा ....
रोजगार मिलेगा ?
हाँ ,हाँ ..जरूर.?
बस एक बार सत्ता में
आ जाने दो ..
फिलहाल कुछ बेंगनी नोटों से
काम चलाओ ..
फिर मुकर गए तो ? हम बोले
अरे भैया ,भरोसा तो करना पडेगा न ..
हम भी कुछ सोच में पड गए ..
नहीं.. नहीं ..ये सौदा नहीं करना हमें
आखिर देश की खुशहाली का सवाल है
ऐसे कैसे बिक जाए ....
हम तो एक सच्चे देशप्रेमी हैं
तभी घरवाली की जोरों की आवाज़ ने
हमें जगाया ...
अजी सुनिए ..
मुन्ना को तेज़ बुखार है
डॉक्टर को दिखाना होगा
दवाइयां लानी होगी
कुछ फल और दूध भी ...
तभी वही आवाज़ फिर से सुनाई दी
अपना अमूल्य मत ..
हमें बेचो.....
हमनें थैला उठाया
घरवाली से बोल
चलो ..तुम भी
तुम्हें भी तो वोट देना है ...।
शुभा मेहता
29 th Nov 2018
Tuesday, 13 November 2018
बाल दिवस
बाल दिवस मन करता है
चलो आज मैं ,
फिर छोटा बच्चा बन जाऊँ
खेलूं कूदूं ,नाचूँ ,गाऊँ
उछल उछल इतराऊँ
मन करता है...
खूब हँसूं मैं
मुक्त स्वरों मेंं
धमाचौकड़ी मचाऊँ
फिर माँ दौड़ीदौडी़ आए
झूठ मूठ की डाँट लगाए
मैं पल्लू उसके छुप जाऊँ
मन करता है .....
उछल उछल कर चढूं पेड़ पर
तोड़ कच्ची इमली खाऊँ
झूलूं बरगद की शाखा पर
गिरूं अगर तो झट उठ जाऊँ
मन करता है.....
शुभा मेहता
15th Nov ,2017
Wednesday, 24 October 2018
बदलाव
बचपन का भी क्या खेला था
घर में ही लगता जैसे मेला था
भुआ-भतीजे ,चाचा -चाची
मामा -मामी ,,नाना -नानी
इत्ते सारे भाई -बहन
खेला करते संग -संग
लडते -झगडते
फिर मिल जाते
नही किसी से शिकायत करते ।
नानी,दादी ,अम्मा ,मौसी
सब चौके में जुट जाती
रोज -रोज कुछ नया बनाती
और प्यार से सबको खिलाती
न कोई शिकवा ,न शिकन
रात ढले सबके बिस्तर छत पर ही लग जाते थे
वाह !! वो दिन भी क्या दिन थे ...
अब कहाँ वो दिन ,वो आपसी प्रेम
सब अपने में व्यस्त ..
मिले भी अगर तो
सबको अपना कमरा चाहिए
खाने का वो स्वाद कहाँ
बाहर से ही मँगवाया जाता है
कौन बनाए इत्ता खाना
प्रश्न जटिल हो जाता है
नया जमाना आया है भैया
नया जमाना आया है ।
शुभा मेहता
25th Oct 2018