लो आई फिर
दीपावली
चलो ,इस बार
मन के किसी कोने में
दीप जलाएं इक
शांति का ,
प्रीति का
स्नेह का
फिर इस
मन दीप से
दीप से दीप जलाएं
दीपमाल से गुँथ जाएँ
जैसे इक माला के फूल
फूल सुगंध से महकाएं
ये दुनियाँ सारी ।
शुभा मेहता
27th Oct. 2016
Thursday, 27 October 2016
दीपावली
Tuesday, 18 October 2016
मेरा बचपन
वो बस्ता लेकर भागना
सखी -सहेलियों से
कानाफूसियाँ
भाग -दौड में
चप्पल टूटना
टूटी चप्पल जोडना
नाश्ते के डब्बे
कपडों पर स्याही के धब्बे
माँ से छुपाना
ओक लगाकर पानी पीना
खेल की छुट्टी में
बेतहाशा दौडना
घुटनों को तोडना
कपडों की बाँह से
पसीना पोंछना
किरायेकी साइकल
के लिए लडना -झगडना
छुपन-छुपाई गिल्ली -डंडा
सितौलिया , भागम भाग
न ट्यूशन का टेंशन
न पहला नंबर ही लाने का झंझट
कितना प्यारा था मेरा बचपन
अब इस आधुनिकता की
दौड में कहाँ खो गया ये सब
आज के बच्चों का तो
जैसे छिन सा गया बचपन ।
शुभा मेहता
18th October 2016
Friday, 16 September 2016
वाह री दुनियाँ
दूर के ढोल सुहावने
पास बजें तो शोर
घर की मुर्गी दाल बराबर
बाहर की अनमोल
कोई अपना ज्ञान बखाने
अधजल गगरी को छलकाए
कोई भैंस के आगे बीन बजाए
पर उसको कुछ समझ न आए
सबको अपना-अपना ध्यान
अपनी ढ़़फली अपना राग
कोई फटे में पैर फँसाए
और उलझ कर खुद रह जाए
अपनी गलती कोई न माने
इक दूजे पर दोष लगाए
इसका ,उसका ,तेरा ,मेरा
करके यूँ ही उमर गँवाए
कोई अंधों में काना राजा
कहीं शेखचिल्ली सी बातें
अजब -गजब हैं लोग तिहारे
वाह री दुनियाँ ,तेरे रूप निराले ।
शुभा मेहता
16th september.2016
Wednesday, 14 September 2016
मातृ भाषा
हिंदी मेरी आन है
हिंदी मेरी शान
मातृ भाषा मेरी
तुझको मेरा प्रणाम
कितनी मीठी
कितनी सहज
शब्दों का भंडार
छन्द -अलंकारों से
सुसज्जित
कभी मुहावरेदार
अभिधा ,लक्षणा व्यन्जना
है इसका अदभुत् संसार
पर आज मेरी
मातृभाषा है कुछ उदास
उसके अपने बच्चे ही
जब कर रहे उसका
तिरस्कार
नहीं रहा उनके जीवन में
माँ हिंदी का स्थान ।
शुभा मेहता
7th Nov , 2016
Wednesday, 24 August 2016
कान्हा.....
ओ कान्हा......
इक बार तो आओ
संग मेरे भी
फाग रचाओ
अरे , सुनते क्यों नहीं ?
बैठ कभी कदंब डाल पर
छेडो इक तो मधुर तान
सुना है , पहले दौडे़ आए थे
सुन पुकार द्रौपदी की
अब क्या हुआ है ?,
क्यों सुनाई नही देती
हजारों द्रौपदियों की
करुण पुकार
न जानें कितनें
दुर्योधन और दुःशासन
करते चीरहरण
प्रश्न तो यही
मेरा है तुमसे
क्या तुम भी
इस कोलाहल में
सुन नही पाते
करुण पुकार ....
शुभा मेहता
24 Aug ,2016
Saturday, 13 August 2016
एकाकी
सुना था
कान होते हैं
दीवारों के भी
पर अब जाना
कि कान ही नहीं
दीवारें तो
होती हैं सशरीर
जब से सीखा है
मैनें जीना
बंद दरवाजों
के भीतर
तब महसूस किया
कि ये तो
बतियाती हैं
घंटों मुझसे
कभी हँसाती
कभी रूलाती
और कभी तो
अपनी बाहें
फैलाकर समेट
लेती हैं
और ले जाती हैं
मुझे इस अकेलेपन से
कहीं दू.....र
जानती हूँ कि
अब ये ही है
मेरी संगी -साथी ।
शुभा मेहता
13th Aug ,2016
Saturday, 6 August 2016
दोस्ती
बचपन में इक दूजे की
थाम उँगली चलना
खेलना -कूदना
लडना -झगडना
एक ही खिलौने के लिए
कभी शाला में
गलती होने पर
एक -दूसरे को
डाँट से बचाने की कोशिश
कभी एक -दूसरे की
कॉपियों से नकल करना
करना अदल-बदल
टिफिन अपने -अपने
कभी घर बुलाना
या उसके घर जाना
घंटों बैठकर
यूँ ही बतियाना
ये नाता दोस्ती का
है कितना प्यारा
कि दिल के
किसी कोने में
दबी हुई अनकही बातें
खुल जाती हैं
सहजता से
उसके आगे
परत दर परत
शायद यही
होती है दोस्ती
समय के साथ
बढती दोस्ती ।
शुभा मेहता
6th Aug ,2016