Saturday, 5 October 2013

नवरात्री

आज से नवरात्री की शुरुआत हो रही है माँ शक्ति का आगमन हो रहा है,  चारों ओर शक्ति - स्वरूपा माँ के आगमन की तैयारियाँ जोर-शोर से हो रही हैं  ।" माँ शेरी वडावी सज करूँ घेर आवो ने" यानि ,हे माँ आपके आगमन हेतु मै अपना गली-मोहल्ला साफ करके आपका
इंतजार कर रही हूँ आप पधारें। माँ का आगमन  प्रतीक है स्वछता का।  हमें घर-मोहल्ले के साथ दिलों को भी साफ करना है।
    शक्ति- स्वरूपा माँ दयामयी हैं ,साथ ही माँ काली और दुर्गा  स्वरूप भी है  जो   प्रतीक है बुराई पर अच्छाई की विजय की  ।

 

             
        
  

Friday, 4 October 2013

फर्क

बंगले मे रहने वाली मेमसाब से पूछा महाराज ने,
   आज कया बनेगा?
     पालक पनीर या पनीर टिक्का,
     बिरयानी और साथ में खीर भी,
     मैडम बोली, हां बनालो सभी कुछ  ।
       उधर, झोपड़ी में भी सवाल वही था,
      आज क्या बनेगा?जाकर रसोई में देखूँ
       कुछ पडा है क्या? थोड़े से चावल या  थोडा सा आटा।
    मिटा सकूं मै जिससे भूख अपने परिवार की  .            
               
                                                              

Thursday, 3 October 2013

ये बच्चे

 दोपहर के बारह बजे होगें, मैं बाहर से आ रही थी, तब देखा शर्मा अंकल अपने दो वर्ष के पोते को लेकर नीचे बगीचे में खड़े थे
मैंने जिज्ञासावश पूछा,अंकल इतनी गर्मी में इसको लेकर कैसे?

वे बोले,अरे इसे अभी से नींद आ रही है अगर अभी सो गया तो सारी दोपहर किसी को सोने नही देगा ।बच्चे को देखा तो नींद से आखें बोझिल थी। मन में सवाल उठा कयूँ करते हैं हम ऐसा? अपने आराम के चक्कर मे बच्चे को अपनी नींद नहीं सोने देना कहाँ तक उचित है?
  
सीढ़ी चढकर अभी अपने घर पहुंच ही रही थी कि पडौस के घर से आवाज़  सुनाई दी  पूरे दिन बस  कार्टून देखता रहता है और कुछ काम नहीं है। पर कया इसके लिये  माता पिता जिम्मेदार नही है? कयोंकि जब बच्चा छोटा होता हैं तब,अपना काम निपटाने के लिये हम उसे कार्टून दिखाते हैं फिर धीरे धीरे बच्चे को उसमें मजा  आने लगता है और फिर वह पूरे समय वहीं देखना चाहता है। फिर हम उसे डांटना शुरू कर देते हैं । बच्चे भी हमारे दोगले व्यवहार से परेशान हो जाते हैं फिर धीरे धीरे उनकी मनमानी शुरू हो जाती हैं। इसलिए हर माता पिता का कर्तव्य बनता है कि बच्चों पर अपनी इचछाएँ न लादी जाएँ अपितु उनके साथ संतुलित  व्यवहार किया जाए  । हाँ उनके थोड़े बड़े होने  पर सही गलत का ज्ञान कराना व सही राह दिखाना जरूरी है पर कयो न इन छोटी छोटी बा तों पर उन्हें अपनी मरजी से जीने दिया जाए।

Wednesday, 2 October 2013

बापू के बंदर

गाधीजी के बंदर तीन सीख हमे देते अनमोल बचपन में पढ़ी थी ये कविता, पर, आज तो मानव को,बुराई देखने में ही रुचि है,हर तरफ खोजता है,लगता है शायदअब अचछाई देखने वाला चशमा ईजाद करना पडेगा बुरी बात पर मत दो कान,पर हमें तो कान लगा कर बुराई सुनने की आदत पडी हुई है,जहाँ चार लोग इकटठे हुए कि शुरू हो गई किसी की बुराई ।और कडवे बोल बोलने में तो इनसान माहिर है ,चाहे किसी को भला लगे या बुरा ।अब तो हम वचनों से भी दरिद्र होते जा रहे हैं । आज कहां है गाधीजी की वो सीख चलो हम कोशिश करें उसे ढूढ़ने की