सुधा पति व बच्चों को ओफिस और स्कूल भेजकर सोच ही रहीथी कि चलो आराम से बैठकर एक कप चाय पी जाए ,तभी डोरबैल बजी उसने सोचा इस समय कौन हो सकता हैं ? उसने दरवाजा खोला तो एक महिला को खडी पाया ।सुथा उसे पहचानने का प्रयत्न कर रही थी सुंदर सी साड़ी बहुत ही सलीके से पहनी गई थी। वह मुसकुरा कर उसे देख रही थी ,तभी वह बोली-पहचाना नही दीदी । उसकी आवाज़ को पहचानते हुए सुधा के मुँह से निकला अरे लाजो की माँ ! सुधा तो अभी भी आश्चर्य में डूबी खड़ी थी । लगभगर पंद्रह साल पुरानी बात होगी,लाजो की माँ सुधा के घर काम करती थी तब वह पांच साल की लाजो को साथ लेकर आती थी और उससे छोटा मोटा काम भी करवाती थी । तब सुधा उसे समझती के तू लाजो को पढ़ा लिखा तो लाजो की माँ कहती कहाँ से स्कूल भेजूँ दीदी,ये स्कूल जाएगी तो काम मे मेरी मदद कौन करेगा? फिर पैसे भी कहाँ से लाऊँगी? तब सुधा ने उसे समझाया कि सरकारी विघालयों में तो लडकियों के लिए मुफत शिक्षण व्यवस्था है और फिर उसके थोडे से प्रोत्साहन से लाजो स्कूल जाने लगी । सुधा भी समय निकाल कर उसे पढाने लगी और उसने पाया कि लाजो की पढाई मे काफी रुचि थी । वह समय-समयफ पर उनकी आर्थिक सहायता भी करती थी। धीरे -धीरे समय बीतता गया और फिर कुछ सालों के बाद लाजो की माँ से सुधा का सम्पर्क टूट गया और आज इतने सालो बाद लाजो की माँ का बदला रूप देखकर वह बहुत खुश थी। लाजो की माँ कह रही थी-दीदी आपके आशीर्वाद से लाजो आज शिक्षिका बन गई है आपने ही मुझे सही राह दिखाई वरना आज मेरी बेटी भी मेरी तरह बरतन कपड़ा साफ कर रही होती । सुधा ने कहा-मैने तो बस राह दिखाई थी ये तो तेरी और लाजो की मेहनत का नतीजा है। लाजो की माँ की आँखों से खुशी के आँसू बह रहे थे । सुधा के चेहरे पर संतोष था।
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